ई-कॉमर्स क्रिएटर इवेंट्स पर सवाल: एग्जीक्यूशन में कमी से ब्रांड्स को खतरा

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
ई-कॉमर्स क्रिएटर इवेंट्स पर सवाल: एग्जीक्यूशन में कमी से ब्रांड्स को खतरा

ब्रांड्स Gen Z को लुभाने के लिए इनफ्लुएंसर-लेड इवेंट्स कर रहे हैं, लेकिन लॉजिस्टिक्स में गड़बड़ी और एक जैसे कंटेंट से चिंताएं बढ़ रही हैं। सवाल यह है कि क्या ये इवेंट्स ब्रांड वैल्यू बढ़ा रहे हैं या घटा रहे हैं।

Experiential Marketing का बढ़ता चलन

आजकल Quick-commerce और ई-कॉमर्स कंपनियां Gen Z कंज्यूमर्स से जुड़ने के लिए क्रिएटर-लेड Experiential Marketing पर दांव लगा रही हैं। ये कंपनियां बड़े-बड़े थीम वाले इवेंट्स आयोजित करती हैं, जैसे कि नकली शादी या नॉस्टैल्जिक रिट्रीट। इन इवेंट्स में सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर्स को बुलाया जाता है ताकि वे ब्रांड के प्रोडक्ट्स के साथ इमर्सिव अनुभव लेते हुए प्रमोशनल कंटेंट बना सकें।

Zepto का 'नानी का घर' और अन्य पहल

Zepto जैसी कंपनियां इस स्ट्रैटेजी का खूब इस्तेमाल कर रही हैं। कंपनी के अनुसार, 'नानी का घर' और शादी-थीम वाले एक्टिवेशन्स का मकसद सिर्फ पार्टिसिपेशन बढ़ाना और यूजर-जेनरेटेड कंटेंट को बढ़ावा देना है। इन प्लेटफॉर्म्स का लक्ष्य सफलता को सिर्फ रीच या इंप्रेशन जैसे 'वैनिटी मेट्रिक्स' से हटाकर, सस्टेन्ड ऑडियंस एंगेजमेंट और ऑर्गेनिक कंटेंट क्रिएशन की ओर ले जाना है।

कंटेंट सैचुरेशन और एग्जीक्यूशन का रिस्क

हालांकि, इन बड़े इवेंट्स के एग्जीक्यूशन पर अब पब्लिक की नजरें टिक गई हैं। एक आम समस्या यह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लगभग एक जैसे कंटेंट की भरमार हो जाती है। जब दर्जनों इनफ्लुएंसर्स एक ही इवेंट में जाते हैं, तो उनका आउटपुट अक्सर Gen Z को पसंद आने वाली ऑथेंटिसिटी और स्पॉन्टेनिटी (स्वाभाविकता) से कोसों दूर होता है। इस एकरूपता से कैंपेन की इफेक्टिवनेस कम हो सकती है, क्योंकि लोग स्टैंडर्ड प्रमोशनल मटेरियल को नजरअंदाज करने लगते हैं।

ऑपरेशनल चुनौतियां और ब्रांड की प्रतिष्ठा

कंटेंट की क्वालिटी के अलावा, लॉजिस्टिक्स में हुई गड़बड़ियां होस्ट ब्रांड्स के लिए सीधा खतरा पैदा कर रही हैं। दिल्ली में Flipkart के 'Glam Fest' जैसे हालिया इंडस्ट्री एक्टिवेशन्स की रिपोर्ट्स में ऑपरेशनल दिक्कतों को उजागर किया गया है। इनफ्लुएंसर्स की फीडबैक में भीड़भाड़ जैसी समस्याएं सामने आईं, क्योंकि ऑर्गनाइजर्स ने वेन्यू की क्षमता से ज्यादा क्रिएटर्स को बुला लिया था। इतना ही नहीं, एक्सपायर्ड प्रोडक्ट्स बांटने के मामले भी सामने आए, जिससे पार्टिसिपेंट्स के बीच काफी नेगेटिव सेंटीमेंट फैला।

मार्केटिंग एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ फ्रीबीज के बदले कंटेंट के आधार पर होने वाले बार्टर एक्टिवेशन्स अक्सर खराब नतीजे देते हैं। जब ब्रांड्स मैनेजमेंट को परफॉर्मेंस दिखाने के लिए सिर्फ ज्यादा क्रिएटर्स को एक्टिवेट करने पर फोकस करते हैं, तो वे इनफ्लुएंसर-ब्रांड रिलेशनशिप की क्वालिटी को नजरअंदाज कर सकते हैं। अगर पार्टिसिपेंट्स का ब्रांड से कोई असली कनेक्शन नहीं होता, तो उनका कंटेंट बनावटी लगता है। और लॉजिस्टिक्स में गड़बड़ी होने पर, इनफ्लुएंसर्स से मिली नेगेटिव पब्लिसिटी मार्केटिंग से होने वाले किसी भी संभावित फायदे से ज्यादा हो सकती है। इन्वेस्टर्स के लिए, मुख्य बात यह है कि ये कंपनियां मार्केटिंग खर्चों और असल ROI (रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट) के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं। भविष्य के कैंपेन की जांच इस आधार पर होगी कि वे सिर्फ सोशल मीडिया पर अस्थायी चर्चा के बजाय असल कस्टमर कन्वर्जन और ब्रांड लॉयल्टी देने में कितने सफल होते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.