भारत का डिजिटल एडवरटाइजिंग मार्केट तेजी से बढ़ रहा है और 2025 में रेवेन्यू **₹947 बिलियन** तक पहुंच गया है, जिसने टेलीविजन को पीछे छोड़ दिया है। साल 2029 तक वैश्विक स्तर पर कुल विज्ञापन खर्च का **80%** हिस्सा डिजिटल के पास होने का अनुमान है, जो निवेशकों के लिए बड़े बदलाव का संकेत है।
विज्ञापन जगत में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। कॉरपोरेट जगत अब ट्रेडिशनल ब्रॉडकास्ट मीडिया से हटकर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर ज्यादा पैसा खर्च कर रहा है। ICICI Securities की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2029 तक ग्लोबल विज्ञापन रेवेन्यू में डिजिटल की हिस्सेदारी 80% हो जाएगी, जो 2024 में 72% थी। कंपनियां अब अपने मार्केटिंग बजट का हिसाब-किताब बेहतर परिणामों के आधार पर चाहती हैं।
भारत की तस्वीर
भारत में यह बदलाव और भी तेज है। डिजिटल मीडिया ने टीवी को पछाड़ते हुए देश का सबसे बड़ा एडवरटाइजिंग सेगमेंट बना लिया है। 2025 में डिजिटल विज्ञापनों का रेवेन्यू ₹947 बिलियन तक पहुंच गया, जो ₹1 ट्रिलियन के माइलस्टोन के बेहद करीब है। कुल भारतीय विज्ञापन बाजार ₹1.5 ट्रिलियन का हो गया है, जिसमें 13.5% की ग्रोथ दर्ज की गई है। डिजिटल सेगमेंट का कुल विज्ञापन बाजार में हिस्सा 63% हो गया है, जो पिछले साल 56% था।
परफॉरमेंस मार्केटिंग का दबदबा
इस ग्रोथ के पीछे 'परफॉरमेंस मार्केटिंग' की बड़ी भूमिका है। ई-कॉमर्स, रिटेल सर्च और इन-गेम एडवरटाइजिंग में भारी निवेश हो रहा है क्योंकि यहाँ सीधे तौर पर सेल्स और कंज्यूमर बिहेवियर को ट्रैक करना आसान है। पारंपरिक मीडिया पर निर्भर कंपनियों के लिए यह चुनौतीपूर्ण समय है क्योंकि कॉर्पोरेट बजट मोबाइल और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं।
जोखिम और चुनौतियां
तेज ग्रोथ के साथ कुछ समस्याएं भी जुड़ी हैं। एड फ्रॉड (बॉट द्वारा फर्जी क्लिक) की घटनाएं बढ़ी हैं। साथ ही, डेटा प्राइवेसी के कड़े नियमों और थर्ड-पार्टी कुकीज के हटने से यूजर बिहेवियर को ट्रैक करना मुश्किल हो गया है। कंपनियों को अब खुद का 'फर्स्ट-पार्टी डेटा' तैयार करने पर जोर देना पड़ रहा है, जिससे छोटे खिलाड़ियों की लागत बढ़ सकती है। निवेशकों को यह देखना होगा कि क्या कंपनियां इन प्राइवेसी चुनौतियों से निपटते हुए अपनी ग्रोथ को बनाए रख सकती हैं।
