Dentsu South Asia के CEO, Harsha Razdan का कहना है कि विज्ञापन एजेंसियों को अब सिर्फ़ क्रिएटिव कैंपेन बनाने से आगे बढ़कर, ग्राहकों के लिए बिजनेस में ठोस ग्रोथ लाने पर ध्यान देना होगा। बढ़ती ग्लोबल आर्थिक दबावों के बीच, एजेंसियों को डेटा, टेक्नोलॉजी और AI को इंटीग्रेट करके अपने ROI (Return on Investment) को साबित करना पड़ रहा है।
एजेंसियों को बदलना होगा अपना नज़रिया
भारत में एडवरटाइजिंग इंडस्ट्री एक बड़े बदलाव के दौर से गुज़र रही है। अब कंपनियां सिर्फ़ पारंपरिक सर्विस मॉडल से आगे बढ़कर, एजेंसियों से बिजनेस में सीधा फायदा चाहती हैं। Dentsu South Asia के CEO, Harsha Razdan ने ज़ोर देकर कहा है कि एजेंसियां अब केवल क्रिएटिव काम के दम पर क्लाइंट्स को नहीं रोक सकतीं। बल्कि, कंपनियों का मूल्यांकन अब इस आधार पर हो रहा है कि वे कितनी अच्छी तरह से कोर बिजनेस प्रॉब्लम को सुलझा सकती हैं और सेल्स ग्रोथ या बेहतर प्रॉफिट मार्जिन जैसे ठोस कमर्शियल नतीजे दे सकती हैं।
'नतीजों पर आधारित' मॉडल की ओर बढ़ता कदम
कई दशकों तक, एजेंसियों के परफॉरमेंस को उनके द्वारा बनाए गए कैंपेन की संख्या या मीडिया बाइंग के स्केल से मापा जाता था। लेकिन अब फोकस बदल गया है और इसे मापे जा सकने वाले नतीजों पर केंद्रित किया गया है। यह बदलाव इसलिए आया है क्योंकि क्लाइंट्स चाहते हैं कि मार्केटिंग के प्रयास सीधे तौर पर उनके बिजनेस की सफलता से जुड़े हों। Dentsu के मुताबिक, इसके लिए एजेंसियों को अपने क्रिएटिव काम को डेटा एनालिटिक्स और टेक्नोलॉजी के साथ इंटीग्रेट करना होगा, ठीक वैसे ही जैसे क्लाइंट्स अपनी डिसीजन-मेकिंग प्रोसेस को मैनेज करते हैं। मार्केटिंग एग्जीक्यूशन के बजाय कमर्शियल स्ट्रेटेजी को प्राथमिकता देने वाले इस मॉडल की ओर बढ़कर, एजेंसियां एक ज़्यादा डिमांडिंग कॉर्पोरेट माहौल में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं।
आर्थिक और तकनीकी दबाव का असर
ग्लोबल और लोकल इकोनॉमिक अनिश्चितताओं के चलते, कंपनियां अपने मार्केटिंग खर्चों का बारीकी से विश्लेषण कर रही हैं। इस माहौल में एजेंसियों पर विज्ञापन में खर्च किए गए हर रुपये की एफिशिएंसी साबित करने का दबाव है। सफल होने और आगे बढ़ने के लिए, कंपनियां रूटीन कामों को ऑटोमेट करने और ऑपरेशनल एफिशिएंसी को बेहतर बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहारा ले रही हैं। AI का लाभ उठाकर, एजेंसियां अपने ह्यूमन टैलेंट को ज़्यादा वैल्यू वाले कंसल्टिंग और स्ट्रेटेजिक कामों पर फोकस करने के लिए फ्री कर सकती हैं। हालांकि, इस ट्रांसफॉर्मेशन में एग्जीक्यूशन से जुड़ी चुनौतियाँ भी हैं, क्योंकि एजेंसियों को इन आर्थिक मुश्किलों का सामना करते हुए अपनी वर्कफोर्स को तेज़ी से स्किल-अप करना होगा और नई डिजिटल क्षमताओं में निवेश करना होगा।
मीडिया के बिखराव से निपटना
आज का मीडिया लैंडस्केप बहुत ज़्यादा फ्रेग्मेंटेड (बिखरा हुआ) है। कंज्यूमर्स स्ट्रीमिंग, सोशल मीडिया, गेमिंग और रिटेल जैसे कई चैनलों पर फैले हुए हैं। इस जटिलता के कारण ब्रांड्स के लिए अपनी एक यूनिफाइड आइडेंटिटी बनाए रखना मुश्किल हो गया है। जिन एजेंसियों में इन विभिन्न टचपॉइंट्स को इंटीग्रेटेड स्ट्रेटेजी के ज़रिए कनेक्ट करने की क्षमता है, उन्हें ग्रोथ के बेहतर अवसर मिल रहे हैं। ई-स्पोर्ट्स, रिटेल मीडिया और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग जैसे क्षेत्र विस्तार के लिए महत्वपूर्ण बन गए हैं। निवेशकों के लिए, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ये बड़ी एजेंसी नेटवर्क्स अपने विभिन्न सर्विस ऑफर्स को कितनी प्रभावी ढंग से एक ऐसी यूनिफाइड टीम में समेकित कर पाती हैं, जो बढ़ते डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन कॉम्पिटिशन के दबाव के बावजूद अपने क्लाइंट्स के लिए लगातार बिजनेस ग्रोथ दे सके।
