भारत के प्रमुख DTH ऑपरेटरों ने सरकार के साथ चल रहे लाइसेंस फीस विवाद के चलते भारी भरकम **₹11,000 करोड़** से ज्यादा का प्रोविजन (Provision) किया है। सब्सक्राइबर्स की घटती संख्या और भारी भरकम रेगुलेटरी देनदारियों के बीच यह सेक्टर गहरे संकट से गुजर रहा है।
भारत का डायरेक्ट-टू-होम (DTH) सेक्टर इस समय बेहद कठिन दौर से गुजर रहा है। कंपनियां लाइसेंस फीस की बकाया रकम को लेकर सरकार के साथ कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं, जिसके चलते उन्हें ₹11,000 करोड़ से ज्यादा का प्रावधान करना पड़ा है। यह विवाद सालों से कोर्ट में लंबित है और कुल सरकारी मांग ब्याज सहित ₹16,000 करोड़ के आसपास पहुंच गई है।
वित्तीय सेहत पर दबाव
इस इंडस्ट्री की वित्तीय स्थिति पर भारी दबाव देखा जा रहा है। उदाहरण के तौर पर, Dish TV India ने फाइनेंशियल ईयर 2026 में ₹807 करोड़ का नेट लॉस दर्ज किया है, वहीं 31 मार्च 2026 तक कंपनी की नेट वर्थ ₹4,200 करोड़ से ज्यादा निगेटिव हो गई है। ऐसे में केवल सैटेलाइट टीवी मॉडल पर टिके रहना कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया है। अब ये कंपनियां ब्रॉडबैंड और डिजिटल सेवाओं की ओर रुख करने को मजबूर हैं।
राहत की उम्मीद और हकीकत
हालांकि, TRAI ने लाइसेंस फीस को घटाकर एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (AGR) का 3% करने और इसे 2027 तक पूरी तरह खत्म करने की सिफारिश की है, लेकिन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (MIB) की ओर से अभी भी इन सुधारों को लागू किया जाना बाकी है। कंपनियां वर्तमान में लागू 8% की लेवी को असंतुलित मान रही हैं।
OTT का बढ़ता असर
रेगुलेटरी दिक्कतों के अलावा, बदलती उपभोक्ता आदतें भी बड़ा झटका दे रही हैं। कनेक्टेड टीवी, OTT प्लेटफॉर्म्स और DD Free Dish जैसे मुफ्त विकल्पों के कारण लाखों ग्राहकों ने DTH सेवाएं छोड़ दी हैं। फिलहाल, सभी की नजरें सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर टिकी हैं, जो यह तय करेंगे कि इन कंपनियों को पूरी बकाया रकम चुकानी होगी या सरकार की ओर से कोई राहत मिलेगी।
