यह ट्रेंड फिल्म इंडस्ट्री के लिए गेम-चेंजर साबित हो रहा है। पहले जहां बड़े बजट और बड़े नामों वाली फिल्में ही सिनेमाघरों में धूम मचाती थीं, वहीं अब कहानी का दम रखने वाली साउथ की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर खूब कमाई कर रही हैं। हैरानी की बात यह है कि ये फिल्में अक्सर कम बजट में बनती हैं, लेकिन उनका रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट (ROI) बड़े सितारों वाली फिल्मों से कई गुना ज्यादा होता है।
ROI के आंकड़े क्या कहते हैं?
आंकड़े बताते हैं कि ₹10 करोड़ से कम बजट में बनी फिल्में भी अब ₹40 करोड़ से लेकर ₹140 करोड़ तक की कमाई कर रही हैं। कुछ मामलों में तो यह रिटर्न 900% तक पहुंच रहा है! मलयालम सिनेमा इसका एक बड़ा उदाहरण है, जहां मात्र ₹10 करोड़ के बजट में बनी फिल्मों ने ₹100 करोड़ का आंकड़ा पार किया है।
साउथ की फिल्मों का बढ़ता दबदबा
यह एफिशिएंसी (efficiency) फिल्म बिजनेस के तौर-तरीकों को बदल रही है। कभी बॉलीवुड का दबदबा रहने वाले डोमेस्टिक बॉक्स ऑफिस रेवेन्यू में साउथ इंडियन सिनेमा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है। 2021 तक, साउथ की फिल्मों का मार्केट शेयर काफी बढ़ गया था, और 2024 तक टॉप 15 भारतीय कमाई करने वाली फिल्मों में आधे से ज्यादा साउथ से थीं। हालांकि, तमिल और तेलुगु फिल्मों का बजट अक्सर ज्यादा होता है, लेकिन मलयालम सिनेमा अपने 'कम बजट, ज्यादा इंपैक्ट' वाले स्टाइल के लिए खास तौर पर जाना जाता है।
स्टार पावर नहीं, स्क्रिप्ट का पावर
इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि सिर्फ स्टार पावर अब बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी की गारंटी नहीं है। स्क्रिप्ट सबसे अहम हो गई है। सोशल मीडिया के इस दौर में दर्शक खराब बनी फिल्मों में दिलचस्पी नहीं दिखाते, चाहे उनमें कोई भी स्टार क्यों न हो। मजबूत कहानियों, रियल-लाइफ थीम और नए जॉनर (genre) पर फोकस करने वाली कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा एक स्थायी ट्रेंड बन गई है। मलयालम सिनेमा तो हमेशा से ही अपनी बेहतरीन कहानियों के लिए मशहूर रहा है, लेकिन अब यह तरीका बाकी साउथ फिल्म इंडस्ट्री में भी आम हो रहा है। यह बॉलीवुड के पुराने दौर से बिलकुल अलग है, जहां स्टार्स की फीस और मार्केटिंग पर ज्यादा खर्च होता था, जबकि प्रोडक्शन क्वालिटी पर ध्यान कम।
OTT प्लेटफॉर्म्स का अहम योगदान
ओवर-द-टॉप (OTT) स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स का उदय इस बदलाव का एक बड़ा कारण रहा है। डिजिटल सेवाओं ने फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूशन और दर्शकों तक पहुंचने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। अब फिल्में डायरेक्ट दर्शकों तक पहुंच रही हैं और जल्दी उपलब्ध हो रही हैं। स्ट्रीमिंग अब फिल्म कंपनियों के लिए कमाई का एक मुख्य जरिया बन गई है, और अक्सर यह सिनेमाघरों से ज्यादा कमाई करती है। इस डिजिटल बदलाव का मतलब है कि 65% से ज्यादा भारतीय दर्शक अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि ये सुविधाजनक हैं और पसंद के हिसाब से फिल्में चुन सकते हैं। कोविड-19 महामारी ने इस शिफ्ट को और तेज कर दिया, जब सिनेमाघर बंद थे तब कई डिजिटल-ओनली रिलीज से कमाई हुई।
चुनौतियां और जोखिम
हालांकि, इस मॉडल में कुछ चुनौतियां भी हैं। अगर ऐसी ही फिल्में बहुत ज्यादा आ गईं तो मार्केट सैचुरेट (saturate) हो सकता है और मुनाफा कम हो सकता है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स जहां पहुंच बढ़ाते हैं, वहीं छोटे बजट की फिल्मों के सिनेमा कलेक्शन को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं, जिससे प्रोड्यूसर्स स्ट्रीमिंग राइट्स बेचने पर ज्यादा फोकस कर सकते हैं। कई मिड-बजट साउथ की फिल्में मार्केटिंग कॉस्ट बचाने के लिए बड़ी हिंदी रिलीज से बचती हैं, जिससे उनकी देश भर में पहुंच सीमित हो जाती है। अच्छी कंटेंट जरूरी है, लेकिन खराब एग्जीक्यूशन (execution) या मार्केटिंग अच्छी स्क्रिप्ट वाली फिल्मों को भी डुबो सकती है। 'RRR' जैसी बड़ी बजट वाली फिल्में, जिनमें शानदार विजुअल्स और एक्शन है, अब भी दर्शकों को खींचती हैं, यह दिखाता है कि कुछ खास तरह की फिल्मों के लिए स्केल (scale) मायने रखता है। पुराने सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों का बंद होना भी पहुंच को प्रभावित कर सकता है।
आगे की राह
साउथ इंडियन सिनेमा का यह सफर ओरिजिनल कहानियों और स्मार्ट फाइनेंशियल प्लानिंग पर आधारित निरंतर सफलता की ओर इशारा करता है। इंडस्ट्री में अच्छे स्क्रिप्ट को बड़े स्टार्स पर तरजीह देना जारी रहने की उम्मीद है, जिससे मिड-बजट फिल्में मुनाफे वाली फिल्ममेकिंग की कुंजी बनेंगी। कंटेंट पर यह फोकस, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से मिली ताकत के साथ, भारत और विदेश दोनों जगह ग्रोथ और व्यापक अपील को बढ़ाएगा, जिससे इंडस्ट्री के नॉर्म्स (norms) बदलेंगे और क्रिएटिव व फाइनेंशियल अचीवमेंट के लिए नए स्टैंडर्ड तय होंगे।