बॉलीवुड संगीतकार तनिष्क बागची और यश राज फिल्म्स के बीच रॉयल्टी भुगतान को लेकर हुए विवाद ने भारतीय संगीत इंडस्ट्री में पारदर्शिता की कमी पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। भले ही 'सैयारा' गाने को लेकर बागची का दावा प्रोडक्शन हाउस ने खारिज कर दिया हो, लेकिन यह घटनाय अपारदर्शी कॉन्ट्रैक्ट स्ट्रक्चर्स की समस्याओं को उजागर करती है।
रॉयल्टी विवाद: क्या है पूरा मामला?
भारतीय संगीत और मनोरंजन जगत में रॉयल्टी भुगतान को लेकर छिड़ी जंग तेज हो गई है। हाल ही में, संगीतकार तनिष्क बागची ने जुलाई 2026 में फिल्म 'सैयारा' के टाइटल ट्रैक के लिए ₹8 लाख की रॉयल्टी न मिलने का आरोप लगाया था। इस आरोप ने तुरंत यह सवाल खड़ा कर दिया कि इंडस्ट्री में कलाकारों को मुआवजा कैसे मिलता है।
यश राज फिल्म्स का जवाब
यश राज फिल्म्स, जो इस प्रोडक्शन हाउस से जुड़ा है, ने इन आरोपों का खंडन किया। कंपनी ने कहा कि सभी कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का पालन किया गया है और इस गाने के लिए रॉयल्टी का भुगतान तीन क्रेडिटेड संगीतकारों - तनिष्क बागची, फहीम अब्दुल्ला और अरसलान निज़ामी - के बीच बराबर बांटा गया था। इस स्पष्टीकरण के बाद, सोशल मीडिया पर बकाये का भुगतान न होने संबंधी पोस्ट हटा ली गई। भले ही यह विशेष मामला सुलझ गया हो, लेकिन इंडस्ट्री के जानकारों का मानना है कि यह एक बड़ी, व्यवस्थित समस्या का लक्षण है, न कि कोई अकेली घटना।
इंडस्ट्री की जड़ें: जटिल समझौते और अधिकार
इंडस्ट्री की मुख्य चुनौती कमर्शियल एग्रीमेंट्स की जटिलता में निहित है। कॉपीराइट एक्ट के 2012 के संशोधन के अनुसार, संगीत कार्यों के लेखकों को साझा रॉयल्टी का अधिकार है। हालांकि, इस अधिकार को लागू करना मुश्किल साबित हुआ है। कई कॉन्ट्रैक्ट्स गाने की व्यावसायिक क्षमता का एहसास होने से काफी पहले ही तय हो जाते हैं। ऐसे में, संगीतकार अक्सर लंबे समय तक राजस्व भागीदारी के बजाय प्रोजेक्ट की विजिबिलिटी और बड़े लेबल्स के साथ जुड़ने को प्राथमिकता देते हैं। इससे एक पावर इम्बैलेंस (शक्ति असंतुलन) पैदा होता है, खासकर नए कलाकारों के लिए जिनके पास बेहतर शर्तों पर बातचीत करने की ताकत कम होती है।
पारदर्शिता की कमी और आगे का रास्ता
कानूनी और वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि मानकीकरण (Standardization) की कमी एक बड़ी बाधा है। रॉयल्टी की गणना अक्सर अपारदर्शी होती है, जिससे क्रिएटर्स के लिए यह ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है कि विभिन्न स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, रेडियो और टेलीविजन से कितना पैसा उत्पन्न हो रहा है। चूंकि राजस्व कई हितधारकों - जैसे प्रोड्यूसर्स, लेबल्स और डिजिटल डिस्ट्रीब्यूटर्स - से होकर गुजरता है, इसलिए एक गाने का ऑडिट ट्रेल (Usage trail) खंडित हो सकता है। पारदर्शिता की इस कमी से अविश्वास पैदा हो सकता है, भले ही भुगतान हस्ताक्षरित कॉन्ट्रैक्ट के अनुसार ही क्यों न हो।
इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसाइटी (IPRS) जैसे उद्योग निकायों ने लंबे समय से बेहतर स्वामित्व दस्तावेज, पूर्ण मेटाडेटा और उपयोग रिपोर्टिंग की वकालत की है। जैसे-जैसे डिजिटल संगीत इकोसिस्टम अधिक जटिल होता जा रहा है, पारदर्शी रिपोर्टिंग और मानकीकृत रॉयल्टी वितरण की मांग बढ़ रही है। व्यापक मनोरंजन क्षेत्र के लिए, ऐसे विवादों में प्रतिष्ठा का जोखिम होता है और नियामक जांच बढ़ सकती है। भविष्य में, इंडस्ट्री पर अधिक पारदर्शी शासन की ओर बढ़ने का दबाव है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि राजस्व-साझाकरण मॉडल स्पष्ट रूप से परिभाषित और सभी क्रिएटर्स के लिए आसानी से सत्यापन योग्य हों, जिससे अंततः सार्वजनिक विवादों की आवृत्ति कम हो सके।
