Arathi Menon का नया उपन्यास 'Da': क्वीयरफोबिया का मानवीय दर्द बयां करती कहानी

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AuthorMehul Desai|Published at:
Arathi Menon का नया उपन्यास 'Da': क्वीयरफोबिया का मानवीय दर्द बयां करती कहानी

लेखिका और स्तंभकार अरथी मेनन का नया उपन्यास 'Da' भारत में क्वीयरफोबिया (Queerphobia) के व्यक्तिगत और सामाजिक परिणामों पर एक गहरी नज़र डालता है। जून 2026 में प्रकाशित यह किताब, कानूनी लड़ाइयों के बजाय व्यक्तियों के वास्तविक जीवन के अनुभवों पर केंद्रित है।

कानूनी इतिहास की पृष्ठभूमि में बुनी कहानी

यह कहानी 2013 से 2018 के बीच की है, जो समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाले कानून, धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से परिभाषित हुई है। इन अहम सालों के घटनाक्रम – पहले कानून की बहाली और फिर उसके ऐतिहासिक निरस्त होने – को आधार बनाकर मेनन दर्शाती हैं कि कैसे बड़े कानूनी बदलाव आम नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करते हैं। किताब इस पृष्ठभूमि का उपयोग मुख्य कथानक के बजाय, पात्रों की सुरक्षा, गरिमा और पारिवारिक स्थिरता की भावना को तय करने वाले माहौल के रूप में करती है।

मानवीय रिश्तों पर मुख्य फोकस

कहानी 13 साल के वेद और उसके दत्तक पिता 'Da' के इर्द-गिर्द घूमती है, जो गे (Gay) हैं। वेद के नजरिए से पाठक उनके पारिवारिक जीवन की जटिलताओं का अनुभव करता है, जिसमें एकल पेरेंटिंग की चुनौतियां और एक खुले तौर पर गे व्यक्ति के रूप में 'Da' को समाज से मिलने वाले पूर्वाग्रह शामिल हैं। यह उपन्यास उनके एक साथ बिताए सामान्य पलों को दर्शाता है, जहां छोटी-छोटी खुशियों का सामना पूर्वाग्रह के भारी बोझ से होता है। एक किशोर को कथावाचक चुनकर, लेखिका पहचान और मासूमियत जैसे विषयों की पड़ताल करती हैं, ताकि इन संवेदनशील मुद्दों को व्यापक पाठकों के लिए सुलभ और प्रासंगिक बनाया जा सके।

समकालीन साहित्य में महत्व

भारतीय प्रकाशन जगत के लिए, 'Da' विविध, सहानुभूतिपूर्ण कहानियों की बढ़ती मांग का एक उदाहरण है जो व्यक्तिगत अनुभवों के माध्यम से सामाजिक प्रगति को संबोधित करती हैं। राजनीतिक चर्चाओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, यह काम सामाजिक कलंक के भावनात्मक प्रभाव को प्राथमिकता देता है। यह साहित्य के उस बड़े हिस्से में योगदान देता है जो भारत में क्वीयर (Queer) अनुभव को मानवीय बनाने का प्रयास करता है।

जैसे-जैसे उपन्यास को आलोचनात्मक ध्यान मिल रहा है, यह भारतीय लेखन के बदलते परिदृश्य को उजागर करता है, जहां रचनाकार कानूनी और राजनीतिक मील के पत्थरों के साथ-साथ समाज के व्यक्तिगत विकास का दस्तावेजीकरण कर रहे हैं। उपन्यास की प्रतिक्रिया बताती है कि घरेलू कहानियों को महत्वपूर्ण सामाजिक टिप्पणियों के साथ मिलाने वाले कथाओं में निरंतर रुचि बनी हुई है, जो रचनात्मक अर्थव्यवस्था और समकालीन भारतीय साहित्य में रुझानों का एक संकेतक है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.