AI का बढ़ता इस्तेमाल: भारतीय छात्रों के लिए पढ़ाई का नया जोखिम?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
AI का बढ़ता इस्तेमाल: भारतीय छात्रों के लिए पढ़ाई का नया जोखिम?

भारतीय छात्र होमवर्क के लिए AI का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स चेता रहे हैं कि फटाफट जवाब पाने के लिए इस पर निर्भरता लंबे समय की लर्निंग को नुकसान पहुंचा सकती है। रिसर्च बताती है कि भले ही काम जल्दी हो जाए, असली ज्ञान (knowledge retention) अक्सर कम हो जाता है। अब एजुकेशन फील्ड में ऐसी पहल हो रही हैं, जिनमें ChatGPT जैसे AI टूल्स को जवाब देने वाली मशीन की जगह स्टडी पार्टनर (study partner) की तरह इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा है, ताकि बच्चों के अकादमिक नतीजे सुधरें।

AI का बढ़ता इस्तेमाल, शिक्षा के लिए नई चुनौती

आजकल भारतीय स्टूडेंट्स पढ़ाई के भारी बोझ को संभालने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का तेजी से इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन इन टूल्स के इस्तेमाल का तरीका अब शिक्षा जगत के लिए एक नई चुनौती बन गया है। AI प्लेटफॉर्म असाइनमेंट को फटाफट पूरा करके फौरी राहत तो देते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स और रिसर्चर एक बड़ी कीमत देख रहे हैं: तुरंत जवाब पाने की इस आसानी से लंबे समय में विषय की समझ में कमी आ जाती है।

लर्निंग रिटेंशन पर असर

हाल के अध्ययनों में यह देखा गया है कि होमवर्क के लिए AI का उपयोग करने वाले छात्र शुरुआत में तो अच्छा प्रदर्शन करते हैं, लेकिन बाद के मूल्यांकन में कॉन्सेप्ट्स को याद रखने में संघर्ष करते हैं। जब छात्र AI से फाइनल जवाब तैयार करवाते हैं, तो वे असल में डीप लर्निंग (deep learning) के लिए ज़रूरी क्रिटिकल थिंकिंग (critical thinking) की प्रक्रिया को दरकिनार कर देते हैं। यह आदत ऐसी निर्भरता पैदा कर सकती है जो परीक्षा के दौरान छात्रों की स्वतंत्र रूप से समस्या-समाधान (problem-solving) की क्षमता को बाधित कर सकती है, खासकर तब जब ऐसे टूल्स उपलब्ध न हों।

अकादमिक नींव की कमजोरियां

कई छात्रों के लिए, अकादमिक अनुभव बार-बार आने वाली कठिनाइयों से बाधित होता है, जो सिर्फ विषय ज्ञान से परे हैं। इनमें मुख्य कॉन्सेप्ट्स को समझने में दिक्कत, स्वतंत्र समस्या-समाधान कौशल (independent problem-solving skills) की कमी और जवाबों को स्पष्ट रूप से लिखने में परेशानी शामिल है। इसके अलावा, पैरेंट्स भी स्क्रीन टाइम और परीक्षा के तनावपूर्ण समय में डिजिटल डिवाइसेस की भूमिका को लेकर चिंता जता रहे हैं। हालिया सर्वे में करीब 89% पैरेंट्स ने इस बात पर जोर दिया है कि बच्चों को अकादमिक उद्देश्यों के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग करने के तरीके पर बेहतर मार्गदर्शन की आवश्यकता है।

जिम्मेदार AI इंटीग्रेशन की ओर कदम

इन मुद्दों को हल करने के लिए, नए एजुकेशनल प्रोग्राम्स AI की भूमिका को जवाब देने वाली मशीन से बदलकर लर्निंग असिस्टेंट (learning assistant) बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। The Economic Times में उजागर की गई पहलें, क्लास 5 से 12 तक के छात्रों को ChatGPT और Gemini जैसे AI टूल्स का रचनात्मक कार्यों के लिए उपयोग करना सिखाने का लक्ष्य रखती हैं। तैयार असाइनमेंट मांगने के बजाय, छात्रों को इन टूल्स का उपयोग जटिल लेक्चर को सारांशित करने (summarize), प्रैक्टिस टेस्ट बनाने और अपनी प्रगति को ट्रैक करने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि टेक्नोलॉजी का प्रभावी ढंग से उपयोग करने की क्षमता एक आवश्यक कौशल बनती जा रही है। AI को प्रयास के विकल्प के रूप में देखने के बजाय, इन प्रोग्राम्स में प्रॉम्प्टिंग स्ट्रेटेजीज़ (prompting strategies) पर जोर दिया जाता है जो छात्रों को आलोचनात्मक रूप से सोचने और जानकारी को सत्यापित (verify) करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। जैसे-जैसे स्कूल और परिवार अनुकूलित हो रहे हैं, मुख्य लक्ष्य टिकाऊ अध्ययन की आदतें विकसित करना है जो छात्र के अपने बौद्धिक विकास पर निर्भर करती हैं। भविष्य में, इन शैक्षिक बदलावों की प्रभावशीलता इस बात से मापी जाएगी कि क्या छात्र AI की दक्षता को गहरी, स्वतंत्र अकादमिक महारत की आवश्यकता के साथ सफलतापूर्वक संतुलित कर पाते हैं।

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