भारत के माइक्रोड्रामा सेक्टर में बड़ा बदलाव आ रहा है। अनुमान है कि अगले 18 महीनों में **80%** कंटेंट AI-आधारित होगा, जिससे प्रोडक्शन की लागत में भारी कमी आएगी। Redseer के अनुसार, इस इंडस्ट्री का रेवेन्यू साल 2027 तक बढ़कर **₹4,600 करोड़** तक पहुंच सकता है।
भारत का एंटरटेनमेंट सेक्टर एक बड़े तकनीकी बदलाव के दौर से गुजर रहा है। अभी तक जहां सिर्फ 20-25% कंटेंट ही AI की मदद से तैयार हो रहा था, वहीं अब यह आंकड़ा अगले 18 महीनों में 80% तक पहुंचने का अनुमान है। इस रफ्तार के पीछे मुख्य कारण प्रोडक्शन की गति और घटती लागत है।
कमाई का बढ़ता ग्राफ
Redseer की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का माइक्रोड्रामा मार्केट साल 2026 में करीब ₹2,300 करोड़ का रेवेन्यू जुटा सकता है। आगे चलकर, साल 2027 तक यह आंकड़ा दोगुना होकर लगभग ₹4,600 करोड़ तक पहुंचने की संभावना है। कंपनियां इस ग्रोथ को भुनाने के लिए अपने प्रोडक्शन वर्कफ्लो में तेजी से AI को शामिल कर रही हैं।
लागत में बड़ी बचत
Kuku और TukTuki Entertainments जैसे प्लेयर्स का मानना है कि AI-असिस्टेड प्रोडक्शन पारंपरिक शूटिंग के मुकाबले कम से कम 30% सस्ता है। समय की बचत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 50 एपिसोड की जो सीरीज पहले 30 से 45 दिनों में बनती थी, वह अब AI टूल्स की मदद से महज 7 दिनों में पूरी हो रही है।
आने वाले समय में, 100 एपिसोड की सीरीज का प्रोडक्शन खर्च जो अभी ₹15 लाख से ₹20 लाख के बीच आता है, वह घटकर ₹5 लाख से ₹6 लाख तक आ सकता है।
क्वालिटी और चुनौतियां
लागत में कमी के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। AI के सामने सबसे बड़ी बाधा विजुअल कंसिस्टेंसी बनाए रखने की रही है, ताकि हर एपिसोड में कैरेक्टर और सेटिंग एक जैसे दिखें। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि अब यह दिक्कत कम हो रही है, लेकिन दर्शकों को बांधे रखने के लिए कंटेंट की गुणवत्ता एक बड़ा फैक्टर रहेगी।
फिलहाल, मार्केट में एक नई रणनीति देखने को मिल रही है, जहां AI-कंटेंट को हाई-वॉल्यूम सेगमेंट में रखा जा रहा है, वहीं मानवीय कलाकारों वाली फिल्मों को 'प्रीमियम' के तौर पर पेश करने की तैयारी है। निवेशकों की नजर अब इस पर टिकी है कि लागत में कमी के बाद क्या कंपनियां अपनी प्रॉफिटेबिलिटी और व्यूअर रिटेंशन को बरकरार रख पाएंगी।
