Prada की ₹75,000 वाली चप्पल पर हंगामा! क्या भारत की पहचान की हो रही चोरी?

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
Prada की ₹75,000 वाली चप्पल पर हंगामा! क्या भारत की पहचान की हो रही चोरी?
Overview

लक्जरी ब्रांड Prada एक बड़े विवाद में फंस गया है। कंपनी अपने एक कलेक्शन में पारंपरिक भारतीय कोल्हापुरी चप्पलों से प्रेरित डिज़ाइन वाली चप्पलें बेच रही है, जिनकी कीमत **$900** (करीब **₹75,000**) तक है। यह दाम असली कोल्हापुरी चप्पलों के **$10-$30** (करीब **₹800-₹2,500**) के मुकाबले काफी ज़्यादा है, और इसी वजह से भारत के क्राफ्ट प्रोटेक्शन सिस्टम पर भी सवाल उठ रहे हैं।

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Prada की चप्पल पर छिड़ी भारतीय क्राफ्ट को लेकर बहस

Luxury brand Prada की कोल्हापुरी चप्पल से प्रेरित फुटवियर को लेकर छिड़ा विवाद, भारत की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने की व्यवस्थाओं की कमजोरी को उजागर करता है। Prada का कहना है कि उन्होंने भारतीय इंडस्ट्री ग्रुप्स और कारीगरों के साथ मिलकर काम किया है, लेकिन $900 की कीमत वाली उनकी चप्पलें, पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पलों से लगभग 30 गुना महंगी हैं। यह बड़ा अंतर बताता है कि मुनाफे को बांटने के बजाय, उस पर ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है। कई लोग इसे 'प्रेरणा' कम और 'सांस्कृतिक विनियोग' (Cultural Appropriation) ज़्यादा मान रहे हैं। यह मुद्दा इसलिए भी गर्माया है क्योंकि भारतीय उपभोक्ता अब अपनी सांस्कृतिक धरोहर को लेकर ज़्यादा जागरूक हो गए हैं और शोषण के ऐसे मामलों पर तुरंत प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

भारत की कमज़ोर क्राफ्ट प्रोटेक्शन व्यवस्था

भारत सरकार ने पारंपरिक उत्पादों को बचाने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे कोल्हापुरी चप्पलों को 2019 में ही ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) का दर्जा मिल चुका है। अब तक देश में 343 से ज़्यादा GI टैग्स रजिस्टर्ड हो चुके हैं। मगर, सच्चाई यह है कि इन सुरक्षा उपायों को लागू करना और उन्हें वैश्विक स्तर पर प्रभावी बनाना पश्चिमी देशों की व्यवस्थाओं से काफी पीछे है। यूरोपीय उत्पादों को मिलने वाले मज़बूत समर्थन के उलट, भारत की GI व्यवस्था में अक्सर तालमेल की कमी देखी जाती है, जिससे हमारी अनमोल धरोहरें ग्लोबल ब्रांड्स द्वारा गलत तरीके से पेश की जाने वाली और चुराई जाने वाली चीज़ों का शिकार हो जाती हैं। मौजूदा सिस्टम में अक्सर मुनाफा उन कारीगरों तक नहीं पहुँच पाता, जिन्होंने पीढ़ियों से इन हुनर को ज़िंदा रखा है।

कीमत का अंतर और बाज़ार का संदर्भ

Prada की $900 (लगभग ₹75,000) की चप्पल और $10-$30 (लगभग ₹800-₹2,500) की असली, हाथ से बनी कोल्हापुरी चप्पलों के बीच का यह भारी अंतर एक बड़ा आर्थिक असंतुलन दिखाता है। ग्लोबल लक्ज़री ब्रांड्स तेज़ी से भारत के बढ़ते डोमेस्टिक लक्ज़री मार्केट पर नज़र गड़ाए हुए हैं, जिसके 2030 तक तिगुना होने की उम्मीद है। वे देश के अनोखे हस्तशिल्पों का भी सहारा ले रहे हैं। यह ट्रेंड लक्ज़री बाइंग में बढ़ रहा है, जहाँ ऑथेंटिसिटी (Authenticity), सस्टेनेबिलिटी (Sustainability) और एथिकल सोर्सिंग (Ethical Sourcing) युवा ग्राहकों के लिए ज़्यादा अहम होती जा रही है। जो ब्रांड्स अपने सांस्कृतिक मूल के प्रति पारदर्शी और सम्मानजनक नहीं हैं, वे इन ग्राहकों को खो सकते हैं। ऐसे विवाद ब्रांड की लॉयल्टी (Loyalty) और भविष्य की बिक्री को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

बेहतर सहयोग और प्रवर्तन की मांग

सिर्फ आलोचना से आगे बढ़कर, हमें ठोस समाधानों की ज़रूरत है। फैशन जर्नलिस्ट सुजाता असोमुल (Sujata Assomull) का कहना है कि भारत के अपने सांस्कृतिक मूल्य को पहचानना ही इस जांच-पड़ताल को बढ़ावा दे रहा है। Prada जैसी कंपनियों के लिए, जो ब्लॉकचेन (Blockchain) जैसी तकनीकों और LVMH, Cartier जैसे बड़े ग्रुप्स के साथ पार्टनरशिप पर भी काम कर रही हैं, अगला कदम सीधे तौर पर सहयोग में नैतिक श्रेय (Ethical Attribution) और राजस्व-साझाकरण (Revenue-Sharing) को शामिल करना होना चाहिए। केवल ट्रेनिंग प्रोग्राम काफी नहीं हैं; कॉन्ट्रैक्ट्स में कारीगरों को उचित मुआवज़ा मिले, यह पक्का करना होगा। लक्ज़री मार्केट, जहाँ LVMH और Kering जैसे कॉम्पिटिटर्स (Competitors) सस्टेनेबिलिटी और भारत में ग्रोथ पर ध्यान दे रहे हैं, बदल रहा है। वे ब्रांड्स जो केवल डिज़ाइन में नहीं, बल्कि अपने संचालन में भी सांस्कृतिक संवेदनशीलता और आर्थिक निष्पक्षता को अपनाएंगे, वे मज़बूत पहचान बना पाएंगे और ग्राहकों का भरोसा जीतेंगे। इसे नज़रअंदाज़ करने का मतलब सांस्कृतिक शोषण जारी रखना और कारीगरों की आजीविका व ब्रांड की छवि, दोनों को नुकसान पहुंचाना होगा।

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Disclaimer:This content is for educational and informational purposes only and does not constitute investment, financial, or trading advice, nor a recommendation to buy or sell any securities. Readers should consult a SEBI-registered advisor before making investment decisions, as markets involve risk and past performance does not guarantee future results. The publisher and authors accept no liability for any losses. Some content may be AI-generated and may contain errors; accuracy and completeness are not guaranteed. Views expressed do not reflect the publication’s editorial stance.