Luxury Market: ग्लोबल मंदी के बीच भारत में लग्जरी की बहार! स्विस घड़ियों का एक्सपोर्ट **35.5%** बढ़ा

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
Luxury Market: ग्लोबल मंदी के बीच भारत में लग्जरी की बहार! स्विस घड़ियों का एक्सपोर्ट **35.5%** बढ़ा
Overview

दुनिया भर में लग्जरी एसेट्स, जैसे महंगी घड़ियां, दुर्लभ व्हिस्की और फाइन वाइन की कीमतें अपने चरम से **10% से 20%** तक गिर गई हैं। इसकी मुख्य वजह मार्केट का सामान्य होना और पश्चिमी देशों में डिमांड का कम होना है। वहीं, दूसरी तरफ भारत इन दिनों लग्जरी सामानों के एक्सपोर्ट में ज़बरदस्त ग्रोथ दिखा रहा है, खासकर स्विस घड़ियों के एक्सपोर्ट में **35.5%** से ज़्यादा की बढ़ोतरी हुई है।

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ग्लोबल लग्जरी मार्केट में आई नरमी

लग्जरी एसेट्स के मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पोस्ट-पेंडेमिक दौर में लग्जरी घड़ियों, दुर्लभ व्हिस्की और फाइन वाइन जैसी चीज़ों की कीमतों में जो उछाल आया था, वह अब धीमा पड़ गया है। इन लग्जरी आइटम्स की कीमतें अपने हाई लेवल से 10% से 20% तक नीचे आ गई हैं। इसका मुख्य कारण मार्केट का सामान्य होना है, जहां पहले स्पेकुलेटिव प्रीमियम और सप्लाई की कमी के चलते कीमतें काफी बढ़ गई थीं। अमेरिका और चीन जैसे प्रमुख बाजारों में आर्थिक सुस्ती और ग्राहकों की घटती परचेजिंग पावर के चलते डिमांड कम हुई है। इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि यह एक स्वस्थ करेक्शन है, न कि लग्जरी गुड्स की वैल्यू में कोई बड़ी स्ट्रक्चरल गिरावट।

बड़े प्लेयर्स के नतीजे और स्विस वॉच इंडस्ट्री का हाल

इस ट्रेंड को बड़े लग्जरी ग्रुप्स के नतीजों से भी समझा जा सकता है। LVMH Moët Hennessy Louis Vuitton ने 2025 में 1% की ऑर्गेनिक रेवेन्यू गिरावट दर्ज की, हालांकि उनका ऑपरेटिंग प्रॉफिट €17.8 बिलियन पर मजबूत रहा। वहीं, Richemont ने मार्च 2025 में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में €21.4 बिलियन की सेल्स दर्ज की, जो कि कांस्टेंट एक्सचेंज रेट पर 4% की बढ़ोतरी है, लेकिन ऑपरेटिंग प्रॉफिट 7% गिर गया। कुल मिलाकर, 2025 में स्विस घड़ियों के एक्सपोर्ट में वैल्यू के हिसाब से 1.7% की कमी आई, जो पिछले दो सालों से जारी गिरावट का हिस्सा है।

भारत में लग्जरी की बढ़ती मांग

जहां दुनिया भर के बाजार सिकुड़ रहे हैं, वहीं भारत लग्जरी गुड्स के लिए एक बड़े ग्रोथ पॉकेट के तौर पर उभर रहा है। 2025 के पहले दस महीनों में भारत को स्विस घड़ियों के एक्सपोर्ट में 35.5% से ज़्यादा की जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई। यह प्रदर्शन दुनिया के 30 से ज़्यादा प्रमुख बाजारों से बेहतर रहा। यह लोकल ग्रोथ, स्विस वॉच इंडस्ट्री के ओवरऑल 1.7% के एक्सपोर्ट वैल्यू डिक्लाइन के बिल्कुल विपरीत है।

'मूल्य' को प्राथमिकता

यह ट्रेंड बताता है कि जहां ग्लोबल सेंटीमेंट ठंडा पड़ रहा है, वहीं भारतीय अमीर ग्राहक अब उन लग्जरी आइटम्स में पैसा लगा रहे हैं जिनमें 'स्थायी सांस्कृतिक, तकनीकी या ओरिजिन-आधारित मूल्य' (enduring cultural, technical, or provenance-based value) हो, न कि सिर्फ हाइप या प्रचार पर आधारित। Kotak Private Luxury Index 2025 की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि जहां ओवरऑल लग्जरी खर्च मजबूत बना हुआ है, वहीं घड़ियों और अन्य कलेक्टिबल्स की कीमतों में ग्लोबल स्तर पर नरमी आई है।

क्वालिटी बनाम हाइप: मार्केट का बंटवारा

एक्सपर्ट्स का मानना है कि लग्जरी मार्केट में एक बड़ा बंटवारा (bifurcation) देखने को मिल रहा है। एक तरफ 'ब्लू-चिप' एसेट्स हैं जिनकी अंदरूनी और स्थायी वैल्यू है, और दूसरी तरफ वे चीजें हैं जिनकी कीमतें केवल स्पेकुलेटिव उछाल के कारण बढ़ीं थीं। वॉच सेक्टर में, इंडिपेंडेंट ब्रांड्स और विंटेज टाइमपीस ने अच्छी पकड़ बनाए रखी है, जबकि 2021 में अपने पीक पर पहुंची मॉडलों की कीमतों में करेक्शन आया है। Rolex, Omega और Patek Philippe जैसी प्रतिष्ठित ब्रांड्स अभी भी अच्छा कर रही हैं, जो मार्केट के इस पोलराइजेशन को दर्शाता है। दुर्लभ व्हिस्की और फाइन वाइन के बाजार में भी अब ब्रांड हाइप से ज़्यादा लिक्विड क्वालिटी और ओरिजिन (provenance) को प्राथमिकता दी जा रही है। Liv-ex Fine Wine 100 इंडेक्स में 3.4% का उछाल इसी का संकेत है।

एक्सपर्ट्स की सलाह और आगे का आउटलुक

LVMH और Richemont जैसे प्रमुख खिलाड़ियों के फाइनेंशियल नतीजों ने इन बदलावों को साफ दिखाया है। खास तौर पर, LVMH का रेवेन्यू 1% गिरा, जबकि Richemont की सेल्स 4% बढ़ी लेकिन प्रॉफिट 7% घटा। वेल्थ एडवाइजर्स सलाह दे रहे हैं कि लग्जरी कलेक्टिबल्स को मुख्य निवेश के बजाय लाइफस्टाइल और विरासत (legacy) के तौर पर देखा जाना चाहिए। इन एसेट्स में अलॉटमेंट के लिए लंबे होल्डिंग पीरियड (long holding periods) रखे जाने चाहिए, और सैटेलाइट पोर्टफोलियो में इनका अलॉटमेंट 5% तक सीमित रखा जाना चाहिए। 2026 के लिए बाजार स्थिर रहने की उम्मीद है, लेकिन भू-राजनीतिक कारक और प्रमुख बाजारों पर ट्रेड पॉलिसी के असर जैसी अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। ग्राहकों का व्यवहार वैल्यू कॉन्शियस (valuation consciousness) की ओर बढ़ रहा है, जिसमें ओरिजिन, ऐतिहासिक प्रासंगिकता और लंबी अवधि की चाहत को स्पेकुलेटिव मोमेंटम पर प्राथमिकता दी जा रही है।

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