United Spirits और Associated Alcohol का FSSAI फ्लेवर नियमों के खिलाफ हाई कोर्ट में केस

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
United Spirits और Associated Alcohol का FSSAI फ्लेवर नियमों के खिलाफ हाई कोर्ट में केस

देश की बड़ी शराब निर्माता कंपनियां, United Spirits और Associated Alcohol & Breweries, FSSAI के निर्देशों के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंची हैं। नियामक (Regulator) को स्पिरिट्स (Spirits) में ऐसे आर्टिफिशियल फ्लेवर (Artificial Flavors) के इस्तेमाल पर आपत्ति है जो प्राकृतिक प्रोफाइल की नकल करते हैं, जिससे लेबलिंग (Labeling) में बदलाव की चिंताएं बढ़ गई हैं। यह मामला फिलहाल कानूनी समीक्षा के अधीन है, और उद्योग संगठन कंपनियों के मौजूदा तौर-तरीकों के बचाव का समर्थन कर रहे हैं।

FSSAI के नियमों पर कंपनियों का विरोध

United Spirits (जो Diageo India की सहायक कंपनी है) और Associated Alcohol & Breweries ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा जारी हालिया निर्देशों को चुनौती देने के लिए बॉम्बे और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। यह कानूनी लड़ाई FSSAI के कुछ खास अल्कोहलिक बेवरेजेज (Alcoholic Beverages) में फ्लेवर (Flavor) के इस्तेमाल और उनकी लेबलिंग (Labeling) को लेकर जारी एक आदेश से उपजी है।

किन ब्रांड्स पर गिरी गाज?

नियामक ने McDowell’s No. 1 Rum, Antiquity Blue Whisky, Royal Challenge Whisky, Bagpiper Deluxe Whisky, और Old Monk Rum के कुछ वेरिएंट्स जैसे कई लोकप्रिय ब्रांड्स को निशाने पर लिया है। FSSAI का आरोप है कि ये ब्रांड्स ऐसे आर्टिफिशियल फ्लेवर का इस्तेमाल कर रहे हैं जो किसी उत्पाद के प्राकृतिक प्रोफाइल की नकल करते हैं। FSSAI का तर्क है कि यह प्रथा खाद्य सुरक्षा और मानक (अल्कोहलिक बेवरेजेज) विनियम, 2018 का उल्लंघन करती है। नियामक ने स्पष्ट किया है कि कुछ परिस्थितियों में फ्लेवरिंग की अनुमति है, लेकिन इसका इस्तेमाल बेस स्पिरिट (Base Spirit) के बिल्कुल वैसे ही फ्लेवर को बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, जैसे कि रम उत्पाद में रम जैसा फ्लेवर मिलाना।

कंपनियों और इंडस्ट्री का पक्ष

इसके जवाब में, कंपनियों का कहना है कि उनके मौजूदा उत्पादन और लेबलिंग के तरीके लंबे समय से चले आ रहे इंडस्ट्री के मानदंडों (Industry Norms) और मौजूदा कानूनी ढांचे के अनुरूप हैं। इन कंपनियों के कानूनी प्रयासों को कन्फेडरेशन ऑफ इंडियन अल्कोहलिक बेवरेज कंपनीज (CIABC) और इंटरनेशनल स्पिरिट्स एंड वाइन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ISWAI) जैसे उद्योग संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है, जो नियामक आवश्यकताओं में अधिक स्पष्टता की वकालत कर रहे हैं।

निवेशकों के लिए क्या है मायने?

निवेशकों के लिए, यह स्थिति रेगुलेटरी रिस्क (Regulatory Risk) की एक नई परत जोड़ती है। United Spirits ने अपने रेगुलेटरी फाइलिंग्स (Regulatory Filings) में बताया है कि इन आदेशों का अभी तक कोई महत्वपूर्ण वित्तीय या परिचालन प्रभाव नहीं पड़ा है। हालांकि, अगर अदालतें नियामक के पक्ष में फैसला सुनाती हैं, तो निर्माताओं को उत्पाद लेबल बदलने या कुछ खास आर्टिफिशियल फ्लेवर को हटाने के लिए बेवरेजेज को री-फॉर्मूलेट (Re-formulate) करने जैसे काम करने पड़ सकते हैं। ऐसे बदलावों से अतिरिक्त लागत आ सकती है और उत्पादन या वितरण में देरी हो सकती है।

चूंकि यह मामला फिलहाल अदालतों के विचाराधीन है, निवेशकों को किसी भी अंतरिम आदेश (Interim Orders) पर नजर रखनी चाहिए जो चुनौती दिए गए ब्रांडों की बिक्री या मार्केटिंग को प्रभावित कर सकते हैं। आने वाले महीनों के लिए एक महत्वपूर्ण बात यह होगी कि क्या कंपनियों को प्राकृतिक और आर्टिफिशियल फ्लेवर प्रोफाइल के बीच स्पष्ट रूप से अंतर बताने के लिए अपनी लेबलिंग को अपडेट करने की आवश्यकता होगी, क्योंकि यह उपभोक्ता की धारणा (Consumer Perception) और भविष्य की मार्केटिंग रणनीतियों (Marketing Strategies) को प्रभावित कर सकता है। यह टकराव पारदर्शिता (Transparency) और सामग्री मानकों (Ingredient Standards) को लेकर अल्कोहल उद्योग पर बढ़ते नियामक दबाव को उजागर करता है।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.