तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट में एक शिकायत दर्ज की है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि केरल मुल्लापेरियार बांध पर ज़रूरी सुरक्षा कार्यों को रोक रहा है। यह विवाद बांध में पानी के स्तर को **142 फीट** तक बढ़ाने को लेकर है, जिसकी इजाज़त **2014** के कोर्ट के फैसले में मिली थी। इस गतिरोध के कारण **131 साल** पुराने इस बांध को मज़बूत करने का काम अटका हुआ है।
मुल्लापेरियार बांध पर बढ़ा टकराव
मुल्लापेरियार बांध को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर गरमा गया है। तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल की है। इस रिपोर्ट में तमिलनाडु ने केरल सरकार पर 'बाधा डालने वाला रवैया' अपनाने का आरोप लगाया है, जिसकी वजह से बांध पर ज़रूरी रखरखाव और सुरक्षा प्रोजेक्ट्स में देरी हो रही है। दोनों राज्यों के बीच इस 131 साल पुरानी कंक्रीट की बांध के प्रबंधन को लेकर यह नया कानूनी कदम इस अनबन को और उजागर करता है।
विवाद की जड़: 2014 का कोर्ट का फैसला
इस पूरे मामले का केंद्र 2014 का सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला है, जिसने बांध की संरचनात्मक सुरक्षा को हरी झंडी दी थी और तमिलनाडु को जलाशय के जल स्तर को 142 फीट तक बढ़ाने की अनुमति दी थी। तमिलनाडु का दावा है कि केरल, 'बेबी डैम' को मज़बूत करने और मुख्य ढांचे में ग्राउटिंग जैसे ज़रूरी सुदृढ़ीकरण कार्यों के लिए अनुमति देने से इनकार करके प्रभावी रूप से इसे रोक रहा है।
केरल पर देरी का आरोप
तमिलनाडु की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये देरी सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि जानबूझकर की जा रही है। आरोप है कि केरल, बांध स्थल के पास पेड़ों को गिराने जैसे महत्वपूर्ण कामों की मंजूरी रोके हुए है। इन पेड़ों को हटाना ज़रूरी है ताकि सुदृढ़ीकरण कार्यों के लिए भारी मशीनरी को वहां तक पहुँचाया जा सके। तमिलनाडु का तर्क है कि इन कामों के बिना, जलाशय की सिंचाई और जल आपूर्ति की पूरी क्षमता का उपयोग नहीं किया जा सकता, जिससे उसके जिलों में कृषि योजना प्रभावित होती है।
केरल की सुरक्षा चिंताएं
वहीं, केरल सरकार अपनी अलग चिंताएं जता रही है। राज्य सरकार ने जल स्तर को मौजूदा सीमा से ऊपर बढ़ाने के किसी भी प्रयास को दृढ़ता से खारिज कर दिया है। केरल का कहना है कि इडुक्की जिले में बांध के नीचे रहने वाले लाखों लोगों के लिए यह जोखिम भरा हो सकता है। राज्य सरकार बार-बार बांध की अखंडता पर चिंता जताती रही है, खासकर इस क्षेत्र के भूकंपीय रूप से सक्रिय होने के कारण।
डेटा शेयरिंग और आपातकालीन योजना पर भी टकराव
पानी के स्तर के अलावा, यह विवाद व्यापक डेटा-शेयरिंग और आपातकालीन योजना के मुद्दों को भी छूता है। तमिलनाडु की रिपोर्ट का दावा है कि केरल ने अभी तक सहमत जोखिम वर्गीकरण के आधार पर कोई आपातकालीन कार्य योजना (EAP) स्थापित नहीं की है। इसके अलावा, तमिलनाडु का आरोप है कि केरल कैचमेंट एरिया में पानी के प्रवाह का अनुमान लगाने के लिए आवश्यक, रीयल-टाइम वर्षा और बाढ़ डेटा प्रदान करने में विफल रहा है। तमिलनाडु के अनुसार, डेटा की यह कमी प्रभावी जल प्रबंधन और बाढ़ की तैयारी में बाधा डालती है।
सड़क मरम्मत पर भी हुई थी तकरार
इससे पहले भी दोनों राज्यों के बीच सड़क मरम्मत को लेकर टकराव हुआ था। केरल ने बांध तक जाने वाली एप्रोच रोड की मरम्मत के लिए तमिलनाडु से ₹87 लाख से अधिक जमा करने का अनुरोध किया था। तमिलनाडु ने 2026 की शुरुआत में फंड के लिए प्रशासनिक मंजूरी दे दी थी, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, केरल ने अभी तक वास्तविक मरम्मत का काम शुरू नहीं किया है।
आगे क्या?
यह स्थिति एक जटिल गतिरोध बनी हुई है। हितधारकों के लिए, सुप्रीम कोर्ट में आगामी सुनवाई महत्वपूर्ण होगी। अदालत से मिलने वाले सुरक्षा अनुमतियों और जल-स्तर के पुराने फैसले के कार्यान्वयन पर निर्देश, स्थल पर संचालन के भविष्य को निर्धारित करेंगे। यह देखना बाकी है कि क्या न्यायपालिका सुदृढ़ीकरण कार्यों के लिए एक नई समय-सीमा तय करती है, या बांध की सुरक्षा और संसाधन आवंटन पर परस्पर विरोधी स्थितियों को हल करने के लिए और मध्यस्थता की आवश्यकता होगी।
