सुप्रीम कोर्ट अब Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) के तहत बेल (Bail) के प्रावधानों की समीक्षा करेगा। यह फैसला लंबे समय से चले आ रहे प्री-ट्रायल डिटेंशन (Pre-trial detention) के मामलों को लेकर उठी चिंताओं के बाद आया है। यह कानूनी समीक्षा भारत में न्यायिक स्थिरता और कानून के शासन पर देरी से होने वाले मुकदमों के प्रभाव को लेकर बढ़ते फोकस को दर्शाती है।
UAPA बेल के नियमों पर क्यों हो रही है चर्चा?
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) के कानूनी ढांचे की जांच कर रहा है। यह कदम प्री-ट्रायल डिटेंशन की लंबी अवधि को लेकर उठी चिंताओं के जवाब में उठाया गया है। हाल ही में अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने कोर्ट से उन मामलों में हस्तक्षेप करने की अपील की थी जिनमें बिना ट्रायल के लंबी कैद काटी जा रही है। उन्होंने विशेष रूप से छात्र कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम के मामलों का जिक्र किया, जो 2020 से हिरासत में हैं।
कानूनी पेंच और 'रिवर्स-बर्डन'
इस कानूनी बहस का केंद्र UAPA की धारा 43D(5) है। यह धारा आरोपी पर बेल (Bail) पाने के लिए अपनी बेगुनाही साबित करने का भारी बोझ डालती है। इस प्रावधान के चलते अक्सर यह मुश्किल हो जाता है कि अगर कोर्ट को लगता है कि अभियोजन पक्ष का केस मजबूत है, तो व्यक्ति को रिहा किया जा सके। इसी बाधा के चलते ऐसे हालात पैदा हुए हैं कि ट्रायल शुरू होने या खत्म होने से पहले ही लोग सालों तक जेल में बिता देते हैं।
बड़ी बेंच को भेजा गया मामला
स्पष्टता की जरूरत को समझते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने UAPA मामलों में बेल कब दी जानी चाहिए, इस सवाल को एक बड़ी बेंच को भेज दिया है। यह फैसला अलग-अलग कोर्ट बेंचों के विरोधाभासी फैसलों के बाद आया है। कुछ फैसलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आर्टिकल 21 के महत्व पर जोर दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि अत्यधिक देरी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है। वहीं, दूसरी बेंचों ने आरोपों की गंभीरता और UAPA द्वारा लगाई गई वैधानिक सीमाओं का हवाला देते हुए सख्त रुख बनाए रखा है।
व्यापार और स्थिरता पर असर
पूरे भारतीय परिप्रेक्ष्य में, इस मामले का समाधान कानूनी प्रणाली की स्थिरता और पूर्वानुमान पर असर डालेगा। एक सुचारू और कुशल न्यायपालिका, व्यापार और रेगुलेटरी माहौल का एक बुनियादी तत्व है। संस्थागत स्थिरता, गवर्नेंस के मानक और कानून का शासन - ये वे प्रमुख घटक हैं जिन पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशक, ESG (Environmental, Social, and Governance) एनालिस्ट सहित, देश के निवेश माहौल का आकलन करते समय नजर रखते हैं।
कम कन्विक्टशन रेट और सुधार की मांग
हाल के डेटा और कानूनी चर्चाओं ने सिस्टमैटिक चुनौतियों को उजागर किया है, जिसमें UAPA के तहत कम कन्विक्टशन रेट (Conviction Rate) शामिल हैं, जिसे विश्लेषक अक्सर 2% से 6% के बीच बताते हैं। ऐसे आंकड़ों ने सुधारों की मांग को प्रेरित किया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि आपराधिक न्याय प्रणाली सुरक्षा आवश्यकताओं और समय पर न्याय के सिद्धांत के बीच संतुलन बनाए रखे।
पिछला राहत का मामला
जुलाई 2026 में, सुप्रीम कोर्ट ने उन दो व्यक्तियों को राहत दी थी जो 12 साल से जेल में थे। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से ट्रायल की 'अत्यधिक धीमी' प्रगति को उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया था। इस कदम ने इस बात पर कोर्ट के बढ़ते फोकस को और रेखांकित किया कि लंबे समय तक हिरासत में रखना त्वरित सुनवाई के अधिकार को कैसे प्रभावित करता है। अब सभी की निगाहें बड़ी बेंच की चर्चाओं और अंतिम फैसले पर टिकी होंगी, जिससे UAPA मामलों में बेल से जुड़े कानूनी मामलों के लिए एक निश्चित मिसाल कायम होने की उम्मीद है।
