सुप्रीम कोर्ट ने **2023** के इलेक्शन कमिश्नर नियुक्ति कानून से जुड़े एक 'स्प्लिट वर्डिक्ट' (Split Verdict) को वापस लेने की याचिका पर सुनवाई के लिए हामी भर दी है। इस मामले में एक जज के 'कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट' (Conflict of Interest) के आरोपों ने कानूनी अनिश्चितता को और गहरा कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने 23 सितंबर, 2026 को आए उस फैसले पर दोबारा गौर करने का फैसला किया है, जिसमें चीफ इलेक्शन कमिश्नर और अन्य इलेक्शन कमिश्नर्स की नियुक्ति से जुड़े कानून पर बेंच के जजों के बीच सहमति नहीं बन पाई थी। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने इस रिकॉल एप्लिकेशन (Recall Application) को स्वीकार कर लिया है।
क्या है कानूनी गतिरोध?
यह विवाद दो जजों की बेंच—जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बीच हुए मतभेद से शुरू हुआ था। मुद्दा यह था कि क्या इस नियुक्ति कानून को बड़ी कॉन्स्टिट्यूशन बेंच (Constitution Bench) के पास भेजा जाना चाहिए या नहीं। जस्टिस दत्ता ने इसकी जरूरत नहीं समझी, जबकि जस्टिस शर्मा का मानना था कि यह जरूरी है। इस असहमति के चलते कानून की संवैधानिक वैधता पर अब तक कोई फाइनल फैसला नहीं हो सका है।
क्यों उठे सवाल?
ताजा याचिका में जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि जस्टिस शर्मा के बेटे इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) के लिए स्टैंडिंग काउंसिल के तौर पर काम करते हैं, जो हितों के टकराव का मामला बनता है। इन आरोपों ने न्यायिक निष्पक्षता पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
कानून पर विवाद क्यों?
2023 का यह कानून आलोचकों के निशाने पर है क्योंकि इसमें सिलेक्शन कमेटी से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को बाहर कर दिया गया है। जानकारों का कहना है कि इससे इलेक्शन कमीशन की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। फिलहाल, चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाली संस्था के कामकाज को लेकर भी कई याचिकाएं कोर्ट में लंबित हैं, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अभी किसी भी अधिकारी को पद से हटाने से इनकार किया है। अब निवेशकों और देश की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि कोर्ट इस कानूनी डेडलॉक को सुलझाने के लिए क्या रास्ता अपनाता है।
