Supreme Court ने 2020 के Industrial Relations Code में 'Industry' की परिभाषा को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई का फैसला किया है। यह मामला तय करेगा कि किन संस्थानों को लेबर कानूनों का पालन करना होगा, जो भविष्य में कॉर्पोरेट कंप्लायंस और खर्चों पर बड़ा असर डाल सकता है।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने Industrial Relations Code (IRC) 2020 के तहत 'Industry' की कानूनी परिभाषा को चुनौती देने वाली याचिका पर समीक्षा करने का निर्णय लिया है। यह याचिका ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (तमिलनाडु) द्वारा दायर की गई है, जिसमें तर्क दिया गया है कि नए कोड में दी गई परिभाषा बहुत विस्तृत है, जिससे संस्थानों के लिए लेबर नियमों से बचने के लूपहोल्स पैदा हो सकते हैं।
कानूनी जंग का आधार
इस बहस के केंद्र में दशकों पुराना 1978 का 'ट्रिपल टेस्ट' है, जो 'बैंगलोर वॉटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड बनाम ए. राजप्पा' मामले से आया था। इस ऐतिहासिक फैसले ने अस्पतालों, नगर पालिकाओं और शैक्षणिक संस्थानों को 'Industry' के दायरे में लाया था। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नया कोड इस सुरक्षा घेरे को कमजोर कर सकता है और चैरिटेबल या सरकारी गतिविधियों में शामिल संस्थानों को छूट दे सकता है।
निवेशकों के लिए क्या है मायने?
कारोबार और निवेशकों के लिए 'Industry' की परिभाषा बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी से तय होता है कि किस कंपनी को इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट और वर्कर राइट्स से जुड़े नियमों का पालन करना है। यदि परिभाषा बदलती है, तो कंपनियों के लिए कंप्लायंस का पूरा ढांचा बदल सकता है, जिसका सीधा असर उनके ऑपरेशनल खर्चों और लेबर मैनेजमेंट पर पड़ेगा।
कोर्ट की अब तक की भूमिका
अगस्त 2026 की कार्यवाही में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत ने कहा था कि IRC एक स्वतंत्र ढांचा है, लेकिन 'ट्रिपल टेस्ट' के कोर तत्व विवादों के समाधान के लिए अभी भी प्रासंगिक हैं। वहीं, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, दीपांकर दत्ता और उज्ज्वल भुइयां ने अपनी असहमति जताते हुए लेबर अधिकारों की सुरक्षा के लिए पुराने मानक को बनाए रखने की वकालत की थी। अब कोर्ट की अगली औपचारिक सुनवाई पर पूरे कॉर्पोरेट जगत की नजरें टिकी हैं।
