सुप्रीम कोर्ट ने इरोड में मंदिर की जमीन को लेकर तमिलनाडु सरकार के मालिकाना हक को अवैध करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार अब इस जमीन पर केवल किरायेदार होगी और उसे **₹31,000** मासिक किराया देना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन पर एक बड़ा फैसला सुनाते हुए तमिलनाडु के इरोड जिले में स्थित 'नागापालयम मरियम्मन-पोनचियम्मन मंदिर' की जमीन से जुड़े गिफ्ट डीड को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने एक अस्थायी ट्रस्टी से जमीन लेकर नियमों का उल्लंघन किया है।
सरकार की बदली भूमिका
अब तमिलनाडु सरकार इस जमीन की मालिक नहीं, बल्कि किरायेदार की तरह काम करेगी। कोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार को मार्च 2019 से प्रभावी ₹31,000 प्रति माह का किराया देना होगा। इसके अलावा, सरकार को मंदिर ट्रस्ट को ₹1,00,000 की कानूनी लागत का भुगतान भी 8 सप्ताह के भीतर करना होगा। भविष्य में हर 3 साल में किराये का पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा, जिसका पूरा अधिकार मंदिर प्रशासन के पास होगा।
निवेशकों और संस्थानों के लिए सबक
यह फैसला सार्वजनिक और धार्मिक संपत्तियों के अधिग्रहण को लेकर सरकार की सीमाओं को स्पष्ट करता है। कोर्ट ने साफ कहा कि धार्मिक संस्थान की संपत्ति देवता में निहित होती है और ट्रस्टी केवल संरक्षक होते हैं। बाजार और निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि किसी भी संस्था से लेनदेन करते समय कानूनी प्रक्रियाओं और टाइटल वेरिफिकेशन की बारीकियां कितनी महत्वपूर्ण हैं। ऐसी संपत्तियों के हस्तांतरण में किसी भी प्रकार की अनियमितता भविष्य में न्यायिक हस्तक्षेप का शिकार हो सकती है।
