Supreme Court ने कर्नाटक सरकार के उस कानून को असंवैधानिक करार दिया है, जिसके जरिए 2011 की विवादित भर्ती प्रक्रिया को वैध बनाने की कोशिश की गई थी। इस फैसले से **362** पदों पर हुई नियुक्तियां रद्द हो गई हैं और अब फिर से भर्ती प्रक्रिया शुरू करनी होगी।
कानून का उल्लंघन और अदालत की सख्ती
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने साफ कर दिया है कि सरकार का यह कदम संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन है। साल 2011 की भर्ती प्रक्रिया पहले ही भ्रष्टाचार और धांधली के आरोपों के कारण विवादों में थी। अदालत ने माना कि राज्य सरकार ने न्यायिक आदेशों को दरकिनार करने के लिए यह नया कानून बनाया था, जो कि विधायी शक्ति का गलत इस्तेमाल है।
अब आगे क्या होगा?
- नियुक्तियां रद्द: इस कानून के तहत की गई सभी 362 ग्रुप A और B अधिकारियों की नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से अमान्य हो गई हैं।
- नई भर्ती का आदेश: सरकार को अब एक पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया के जरिए इन पदों के लिए फिर से भर्ती शुरू करनी होगी।
- उम्मीदवारों के लिए निर्देश: अदालत ने पुराने याचिकाकर्ताओं को एक बार के लिए उम्र सीमा में छूट दी है, लेकिन स्पष्ट किया है कि उन्हें पिछले वर्षों का वेतन या सीनियरिटी का लाभ नहीं मिलेगा।
गवर्नेंस पर सवाल
यह फैसला दिखाता है कि कैसे प्रशासनिक फैसलों में कानूनी चूक निवेशकों और जनता के भरोसे को प्रभावित करती है। राज्य सरकार को अब इस पूरे भर्ती चक्र को 'स्क्रैच' से शुरू करने का बोझ उठाना होगा। इस मामले में 2013 में CID की जांच में भी गंभीर अनियमितताएं पाई गई थीं, जिसे देखते हुए अदालत ने प्रशासनिक शुचिता बनाए रखने पर जोर दिया है। अब देखना होगा कि कर्नाटक सरकार अदालत के निर्देशों का पालन करते हुए कितनी जल्दी इस प्रक्रिया को पूरा करती है।
