सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस चुनौती को खारिज कर दिया है जिसमें हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि Drugs and Cosmetics Act के चैप्टर IV के तहत ड्रग एन्फोर्समेंट की स्वतंत्र शक्तियां राज्य नियामकों (State Regulators) के पास ही रहेंगी। हालांकि, दवाओं के इंपोर्ट और क्लिनिकल ट्रायल पर केंद्र की निगरानी पहले की तरह जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने केंद्र और राज्य के ड्रग नियामकों के बीच अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) की सीमाओं को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। यह कानूनी विवाद इस बात पर केंद्रित था कि क्या Central Drugs Standard Control Organisation (CDSCO) के इंस्पेक्टरों के पास दवाओं के निर्माण, सैंपल लेने और फार्मा कंपनियों पर मुकदमा चलाने का स्वतंत्र अधिकार है।
अधिकार क्षेत्र का दायरा
अब यह तय हो गया है कि दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण से जुड़ी प्रवर्तन गतिविधियां केवल राज्य द्वारा नियुक्त नियामकों के अधिकार क्षेत्र में आएंगी। इस फैसले ने CDSCO की समग्र भूमिका को खत्म नहीं किया है, लेकिन चैप्टर IV के तहत उनकी स्वतंत्र शक्तियों पर लगाम जरूर लगा दी है। केंद्र सरकार के पास अभी भी नई दवाओं की मंजूरी, क्लिनिकल ट्रायल, दवाओं के इंपोर्ट और वैक्सीन जैसी महत्वपूर्ण चीजों की निगरानी का अधिकार सुरक्षित है।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह कानूनी लड़ाई Salus Pharmaceuticals से जुड़े एक मामले से शुरू हुई थी, जहां CDSCO के एक इंस्पेक्टर ने जालंधर के एक अस्पताल से दवा के सैंपल लिए थे। निर्माता ने इंस्पेक्टर के इस कदम को चुनौती देते हुए कहा था कि यह अधिकार राज्य के अधिकारियों का है। हाईकोर्ट के पुराने फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखने से अब राज्य के अधिकारियों का प्रभाव बढ़ गया है।
फार्मा इंडस्ट्री पर क्या होगा असर?
फार्मा कंपनियों के लिए अब अनुपालन (compliance) की प्रक्रिया और सख्त हो सकती है। कंपनियों को अब यह स्पष्ट करना होगा कि किस मामले में राज्य नियामक काम करेंगे और कहाँ केंद्र की भूमिका होगी। आने वाले समय में प्रवर्तन संबंधी प्रशासनिक प्रोटोकॉल में बड़े बदलाव देखे जा सकते हैं, जिससे भविष्य में प्रक्रियात्मक उलझनों को कम करने में मदद मिल सकती है।
