सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है और 2018 के संशोधनों को बरकरार रखा है। इस फैसले से कानूनी स्पष्टता बनी रहेगी और कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए मौजूदा सुरक्षा उपायों पर मुहर लग गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 से जुड़े संवैधानिक सवालों पर अपना अंतिम फैसला सुना दिया है। चीफ जस्टिस Surya Kant की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें 2018 के संशोधन को रद्द करने की मांग की गई थी।
क्या था कानूनी विवाद?
इस मामले में मुख्य चुनौती Section 18A को लेकर थी, जो एंटीसिपेटरी बेल (Anticipatory Bail) के प्रावधान को सीमित करता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है और इसके दुरुपयोग की संभावना है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून बनाने का अधिकार संसद का है और न्यायपालिका उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
कॉरपोरेट और निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
निवेशकों और बिजनेस घरानों के लिए यह फैसला 'रेगुलेटरी स्टेबिलिटी' (Regulatory Stability) के नजरिए से काफी अहम है। कोर्ट ने साफ किया कि 'Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita' के तहत पुलिस को गिरफ्तारी से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि मामला वैध है। कोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह प्रक्रियात्मक दुरुपयोग (Procedural Abuse) के मामलों में हस्तक्षेप कर सके।
यह फैसला कॉरपोरेट सेक्टर में अनुपालन (Compliance) और वर्कफोर्स मैनेजमेंट को लेकर अनिश्चितता को कम करेगा, जिससे एक स्थिर कारोबारी माहौल बना रहेगा।
