Supreme Court की दो जजों की बेंच ने 2023 के Election Commission Appointment Law पर एक बड़ा फैसला सुनाया है। जजों में मतभेद के चलते अब मामला Chief Justice of India के पास गया है। फाइनेंशियल मार्केट के लिए यह खबर अहम है क्योंकि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता सीधे तौर पर पॉलिसी स्टेबिलिटी से जुड़ी है।
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने बुधवार को 2023 के Election Commission Act को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर एक Split Verdict दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बीच इस बात पर असहमति थी कि क्या इस मामले को 5 जजों की Constitution Bench के पास भेजा जाना चाहिए। इस डेडलॉक के कारण, अब अंतिम निर्णय Chief Justice of India (CJI) को लेना होगा।
विवाद का केंद्र
यह मामला 2023 के उस नए कानून से जुड़ा है जिसने चुनाव आयुक्तों को चुनने की प्रक्रिया को बदल दिया है। इस कानून के तहत, सिलेक्शन कमेटी से CJI को हटाकर उनकी जगह प्राइम मिनिस्टर द्वारा नॉमिनेट किए गए एक यूनियन कैबिनेट मिनिस्टर को शामिल किया गया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह बदलाव चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को कमजोर करता है।
निवेशकों के लिए क्यों है जरूरी?
इन्वेस्टर्स और बाजार के जानकारों के लिए, रेगुलेटरी और संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता देश के 'रिस्क प्रोफाइल' को मापने का एक महत्वपूर्ण पैमाना है। इंस्टीट्यूशनल स्टेबिलिटी ही पॉलिसी प्रेडिक्टेबिलिटी का आधार होती है, जो लंबे समय के लिए कैपिटल इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करती है। अगर इन संस्थाओं की स्वायत्तता पर सवाल उठते हैं, तो गवर्नेंस एनवायरमेंट को लेकर मार्केट सेंटीमेंट पर असर पड़ सकता है।
कोर्ट की टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने मौजूदा सिलेक्शन कमेटी की संरचना पर संदेह जताया। उन्होंने कहा कि कैबिनेट मिनिस्टर के शामिल होने से पावर का संतुलन बिगड़ सकता है, क्योंकि कमेटी में एग्जीक्यूटिव पावर को काउंटर करने वाला कोई न्यूट्रल सदस्य नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संस्था को न केवल स्वतंत्र होना चाहिए, बल्कि जनता की नजर में उसकी छवि भी निष्पक्ष होनी चाहिए।
बेंच ने पेंडिंग संवैधानिक मामलों के भारी दबाव पर भी चिंता जताई है। फिलहाल सबकी नजरें CJI के अगले प्रशासनिक कदम पर हैं, जो यह तय करेंगे कि इस मामले की सुनवाई के लिए बड़ी बेंच का गठन कब और कैसे होगा।
