सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को कावेरी जल विवाद पर **12 अक्टूबर** तक औपचारिक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। तमिलनाडु ने **20 TMC** पानी की कमी का दावा किया है, जिसका असर कृषि और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को तमिलनाडु के 20 TMC पानी की कमी वाले दावे पर अपना पक्ष रखने को कहा है। जस्टिस विक्रम नाथ की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले में 12 अक्टूबर की समय सीमा तय की है। तमिलनाडु का तर्क है कि पानी की कमी से उनकी खरीफ की फसल को भारी नुकसान हो रहा है, जिससे सूखे के वर्षों में संसाधनों के बंटवारे को लेकर फिर से बहस छिड़ गई है।
सूखे के बीच पानी का बंटवारा
यह विवाद बारिश की कमी के दौर में पानी के वितरण को लेकर है। तमिलनाडु का कहना है कि कोर्ट और अथॉरिटी के आदेशों के बावजूद उन्हें पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है। दूसरी ओर, कर्नाटक का कहना है कि वे कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) के निर्देशों का पालन कर रहे हैं और 8 सितंबर के आदेशानुसार 6,000 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा है, जबकि राज्य खुद गंभीर सूखे का सामना कर रहा है।
कृषि क्षेत्र और बाजार पर असर
इन्वेस्टर्स और बाजार के जानकारों के लिए यह स्थिति चिंताजनक है क्योंकि कावेरी डेल्टा क्षेत्र धान की खेती का बड़ा केंद्र है। पानी की कमी का सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ता है, जो खाद्य कमोडिटी की कीमतों को प्रभावित कर सकती है और क्षेत्रीय कृषि व्यवसायों के मुनाफे को कम कर सकती है। इसके अलावा, पानी पर निर्भर पावर प्लांट और अन्य इंडस्ट्रीज को भी सप्लाई चेन में रुकावट का सामना करना पड़ सकता है।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण (CWMA) ही इस मुद्दे को हल करने के लिए मुख्य विशेषज्ञ निकाय है। कोर्ट ने हर छोटी बात के लिए दखल देने के बजाय इसी नियामक ढांचे का उपयोग करने पर जोर दिया है। अब 12 अक्टूबर की सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इस पर आने वाला कोई भी निर्णय सिंचाई और कृषि भविष्य के लिए दिशा तय करेगा।
