सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने कंपनियों की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए एक नया 'थ्री-फोल्ड टेस्ट' लागू किया है। अब सिर्फ बोर्ड के सदस्य ही नहीं, बल्कि फैसले लेने वाले हर बड़े अधिकारी की हरकतों के लिए कंपनी को जिम्मेदार ठहराया जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने Sanofi India Ltd. बनाम CBI मामले में एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कॉरपोरेट जगत के लिए जवाबदेही का दायरा बढ़ा दिया है। अब कोई कंपनी केवल यह कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकती कि मामला बोर्ड के स्तर का नहीं था। यदि किसी कर्मचारी के पास निर्णय लेने का महत्वपूर्ण अधिकार है, तो उसकी गलतियों का खामियाजा अब कंपनी को भी भुगतना पड़ सकता है।
कैसे काम करेगा यह 'थ्री-फोल्ड टेस्ट'?
कोर्ट ने जिम्मेदारी तय करने के लिए तीन स्तर का मापदंड तय किया है:
- दस्तावेजी जांच: सबसे पहले कंपनी के बोर्ड रेजोल्यूशन या उप-नियमों (Bylaws) को देखा जाएगा कि क्या उस व्यक्ति को अधिकार दिए गए थे?
- स्वतंत्रता का आकलन: यदि दस्तावेज स्पष्ट नहीं हैं, तो यह देखा जाएगा कि क्या वह व्यक्ति अपने दैनिक कार्यों में स्वतंत्र निर्णय ले रहा था?
- कानूनी नियम: यदि पहले दो स्तरों से बात स्पष्ट नहीं होती, तो कानून के विशिष्ट नियमों के आधार पर फैसला लिया जाएगा।
निवेशकों के लिए चेतावनी और गवर्नेंस का महत्व
यह फैसला भारतीय कंपनियों के लिए 'Delegation of Authority' यानी अधिकारों के बंटवारे के मैट्रिक्स को अपडेट करने की चेतावनी है। अब कंपनियों को यह स्पष्ट रखना होगा कि कौन सा व्यक्ति किस स्तर का वित्तीय या परिचालन निर्णय ले सकता है।
निवेशकों के लिए सलाह है कि वे उन कंपनियों पर नजर रखें जो अपने कंप्लायंस (Compliance) और आंतरिक गवर्नेंस (Internal Governance) को मजबूत कर रही हैं। जिन कंपनियों के पास अधिकारों का स्पष्ट डॉक्यूमेंटेशन नहीं है, उन पर कानूनी और प्रतिष्ठा (Reputation) का खतरा बढ़ सकता है। अब केवल कागजी कार्रवाई ही नहीं, बल्कि पारदर्शिता ही कंपनी के लिए सबसे बड़ा बचाव (Defense) होगी।
