Supreme Court ने सोशल मीडिया पर नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में अनिवार्य एज-वेरिफिकेशन और सख्त नियमों की मांग की गई है, जिसका सीधा असर टेक कंपनियों के ऑपरेटिंग मॉडल पर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर एक औपचारिक जांच शुरू कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, कानून मंत्रालय और NCPCR को नोटिस जारी किया है। याचिका में तर्क दिया गया है कि बच्चों को प्लेटफॉर्म के नुकसानदेह कंटेंट से बचाने के लिए मौजूदा सुरक्षा उपाय नाकाफी हैं।
नई गाइडलाइंस की मांग
याचिका में सरकार से एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार करने की मांग की गई है, जिसमें तीन मुख्य बातें शामिल हैं: अनिवार्य एज-वेरिफिकेशन (उम्र की जांच), उम्र के हिसाब से एक्सेस कंट्रोल और नाबालिगों के लिए अनिवार्य 'पैरेंटल कंसेंट' (अभिभावकों की सहमति)। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मौजूदा सोशल मीडिया एल्गोरिदम बच्चों में स्क्रीन टाइम बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं, जिससे उनमें एंग्जायटी और नींद की कमी जैसी समस्याएं हो रही हैं।
निवेशकों के लिए क्या है रिस्क?
बाजार के जानकारों के लिए यह कानूनी लड़ाई एक बड़े बदलाव का संकेत है। अधिकांश बड़ी सोशल मीडिया कंपनियां अपने विज्ञापन रेवेन्यू के लिए 'यूजर इंगेजमेंट' पर निर्भर हैं। यदि कोर्ट अनिवार्य एज-वेरिफिकेशन लागू करता है, तो कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म के आर्किटेक्चर में बड़े बदलाव करने पड़ेंगे। इससे न केवल ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ेगी, बल्कि कंपनियों के लिए विज्ञापन से होने वाली कमाई पर भी असर पड़ सकता है।
अगला कदम
फिलहाल भारत में 'IT रूल्स 2021' लागू हैं, लेकिन नया नियम आने पर टेक कंपनियों को डेटा प्राइवेसी और वेरिफिकेशन टेक्नोलॉजी पर भारी निवेश करना होगा। निवेशकों की नजर अब 7 दिसंबर को होने वाली अगली सुनवाई पर है, जो भविष्य में सोशल मीडिया कंपनियों की ग्रोथ स्ट्रैटेजी और अनुपालन (Compliance) के नए मानकों को तय करेगी।
