लापता बच्चों की तलाश को और ज़्यादा कारगर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (NCPCR) को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एक ऐसी याचिका पर आया है जिसमें बच्चों के लिए राष्ट्रीय DNA और बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली (national DNA and biometric identification system) बनाने की मांग की गई है।
DNA सिस्टम की ज़रूरत क्यों?
सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (PIL) में कहा गया है कि लापाता और बचाए गए बच्चों को खोजने के मौजूदा तरीकों को और बेहतर बनाने की ज़रूरत है। याचिकाकर्ता, वकील रीपाक कंसल, का सुझाव है कि एक राष्ट्रीय स्तर का DNA और बायोमेट्रिक पहचान डेटाबेस बनाया जाना चाहिए। यह सिस्टम मौजूदा पुलिस रिकॉर्ड, शेल्टर होम, बाल कल्याण समितियों (Child Welfare Committees) और मानव तस्करी-रोधी इकाइयों (Anti-Human Trafficking Units) के डेटा को एक साथ जोड़ेगा। इससे बच्चों की पहचान की प्रक्रिया को तेज़ और ज़्यादा सटीक बनाने में मदद मिलेगी।
प्रस्ताव के अनुसार, जिन बच्चों की पहचान नहीं हो पा रही है, उनके DNA सैंपल लिए जाएंगे। इसी तरह, लापता बच्चों के जैविक माता-पिता या अभिभावकों के भी DNA सैंपल लिए जाएंगे। इस वैज्ञानिक मिलान (scientific matching) से बच्चों और उनके परिवारों के बीच पुख्ता लिंक स्थापित हो सकेगा, जो तस्करी या लंबे समय तक बिछड़ने के मामलों में अक्सर मुश्किल होता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर टास्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए ताकि मानव तस्करी और बच्चों के गुम होने के मामलों से निपटने में बेहतर तालमेल हो सके।
गोद लेने की प्रक्रिया और प्राइवेसी का सवाल
इस याचिका का एक अहम हिस्सा गोद लेने की प्रक्रिया से जुड़ा है। अवैध गोद लेने और तस्करी के जोखिम को कम करने के लिए, याचिका में यह मांग की गई है कि गोद लेने के लिए प्रस्तावित बच्चों के DNA की अनिवार्य रूप से जांच की जाए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि बच्चा लापता के तौर पर रिपोर्ट किया गया है या नहीं, और पहचान की गलत बयानी को रोका जा सकेगा।
हालांकि, इस तरह के बड़े पैमाने पर DNA और बायोमेट्रिक डेटाबेस बनाने से डेटा प्राइवेसी (data privacy) से जुड़े सवाल भी उठते हैं। बच्चों की सुरक्षा के साथ-साथ उनकी संवेदनशील निजी जानकारी को सुरक्षित रखने के लिए मज़बूत कानूनी सुरक्षा उपायों की ज़रूरत होगी। भविष्य में बनने वाली किसी भी प्रणाली को डेटा सुरक्षा मानकों और व्यक्तियों के निजता के अधिकारों का सख्ती से पालन करना होगा। कोर्ट का यह कदम इस मामले में एक औपचारिक कानूनी प्रक्रिया की शुरुआत है, जहाँ सरकार और संबंधित आयोगों को इस तरह की प्रणाली की व्यावहारिकता और नियामक ज़रूरतों पर अपना पक्ष रखना होगा।
अब गृह मंत्रालय (Ministry of Home Affairs) और NCPCR इस पर अपना जवाब दाखिल करेंगे। इसके बाद की अदालती कार्यवाही में इस डेटाबेस को बनाने की व्यावहारिक चुनौतियाँ, अनुमानित लागत, डेटा सुरक्षा के लिए आवश्यक कानूनी ढाँचा और बायोमेट्रिक जानकारी के संग्रह और उपयोग को नियंत्रित करने वाले मानक संचालन प्रक्रियाएं (standard operating procedures) जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
