सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर उस याचिका पर जवाब मांगा है, जिसमें प्रदर्शनों के दौरान होने वाले संपत्ति के नुकसान के लिए आयोजकों को वित्तीय रूप से उत्तरदायी बनाने की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में होने वाले सार्वजनिक प्रदर्शनों के रेगुलेशन को लेकर कानूनी समीक्षा शुरू कर दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। यह याचिका सार्वजनिक सभाओं के दौरान जवाबदेही तय करने की मांग करती है।
क्या है याचिका में?
याचिका का मुख्य उद्देश्य एक ऐसा फ्रेमवर्क बनाना है, जिसके तहत प्रदर्शन के आयोजक सार्वजनिक या निजी संपत्ति को होने वाले किसी भी नुकसान के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से जिम्मेदार होंगे। यह खबर उन निवेशकों और कारोबारियों के लिए अहम है जिनका संचालन कनॉट प्लेस, आईटीओ और प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में है, क्योंकि अक्सर इन प्रदर्शनों से लॉजिस्टिक्स और बिजनेस ऑपरेशन्स पर असर पड़ता है।
प्रस्तावित बदलाव और फंडिंग का खुलासा
याचिका में केवल वित्तीय जवाबदेही ही नहीं, बल्कि फंडिंग सोर्स का खुलासा करने की भी मांग की गई है। इसमें यह स्पष्ट करने को कहा गया है कि किसी भी प्रकार की वित्तीय मदद विदेशी या अज्ञात स्रोतों से न आई हो। यदि जानकारी गलत पाई जाती है, तो प्रदर्शन की अनुमति रद्द हो सकती है और आपराधिक कार्रवाई भी की जा सकती है।
इसके अलावा, अदालत से 'डेजिग्नेटेड प्रोटेस्ट जोन' (तय प्रदर्शन स्थल) बनाने की मांग की गई है, ताकि व्यावसायिक गतिविधियों और आम जनता को होने वाली परेशानियों को कम किया जा सके।
बिजनेस पर असर
निवेशकों के नजरिए से 'बिजनेस कंटिन्यूटी' सबसे बड़ी चिंता है। बार-बार होने वाली बाधाओं से रिटेल आउटलेट्स और सप्लाई चेन प्रभावित होती है। यदि प्रदर्शनों के कारण होने वाले नुकसान की स्पष्ट कानूनी जिम्मेदारी तय होती है, तो यह आने वाले समय में उन व्यवसायों के जोखिम मूल्यांकन (Risk Assessment) को बदलने की क्षमता रखता है जो राजधानी क्षेत्र में अपनी इकाइयां चला रहे हैं। अब सबकी नजरें सरकार और दिल्ली पुलिस के जवाब पर टिकी हैं कि इस मामले में आगे क्या कानूनी रास्ता अपनाया जाता है।
