जंतर मंतर पर प्रदर्शन: SC ने सरकार से पूछा - क्या यह जगह अब भी सही है?

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AuthorAditi Chauhan|Published at:
जंतर मंतर पर प्रदर्शन: SC ने सरकार से पूछा - क्या यह जगह अब भी सही है?

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शनों के लिए इसकी उपयुक्तता का मूल्यांकन करने को कहा है। यातायात और सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर चिंताएं जताई गई हैं। यह कानूनी समीक्षा एक याचिका के बाद आई है, जिसमें दिल्ली के केंद्रीय इलाके में बड़े पैमाने पर होने वाले आधुनिक प्रदर्शनों के प्रबंधन की चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया है।

जंतर मंतर पर प्रदर्शनों पर सुप्रीम कोर्ट की नज़र

नई दिल्ली में सार्वजनिक प्रदर्शनों के लिए एक निर्धारित स्थल के तौर पर जंतर मंतर की स्थिति की औपचारिक समीक्षा शुरू कर दी गई है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को निर्देश दिया है कि वे केंद्र सरकार से इस बाबत निर्देश प्राप्त करें। यह समीक्षा एक ऐसी याचिका पर की जा रही है जो आधुनिक प्रदर्शनों के लिए इस स्थान की उपयुक्तता पर सवाल उठाती है।

लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा की चुनौतियाँ

याचिकाकर्ता सतीश चंद्र कौशिक का तर्क है कि यह जगह अब सार्वजनिक सभाओं के लिए उपयुक्त नहीं है। कानूनी चुनौती में आने-जाने (ingress and egress) से जुड़ी बड़ी समस्याओं का ज़िक्र है, जिसमें कहा गया है कि बड़े प्रदर्शनों के दौरान ज़रूरी सेवाओं और चिकित्सा सहायता की आवाजाही अक्सर बाधित होती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जंतर मंतर को एक अलग युग में छोटे, प्रबंधनीय समूहों के लिए नामित किया गया था, जबकि आजकल के प्रदर्शन, जो अक्सर डिजिटल माध्यमों से आयोजित होते हैं, तेज़ी से बढ़ सकते हैं और उनमें स्पष्ट नेतृत्व संरचनाओं का अभाव होता है।

लॉजिस्टिक्स के नज़रिए से, संसद, सेंट्रल विस्टा और आसपास के व्यावसायिक केंद्रों से इसकी निकटता सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशीलता बढ़ाती है। इस क्षेत्र में लंबे समय तक चलने वाले प्रदर्शनों के कारण अक्सर यातायात मोड़ना पड़ता है और रोज़मर्रा के व्यापार और मध्य दिल्ली में काम करने वाले पेशेवरों के आवागमन में बाधा आती है। याचिकाकर्ता ने इन गतिविधियों को रामलीला मैदान में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया है, जिसे बड़ी भीड़ को समायोजित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

कानूनी मिसालें और सार्वजनिक व्यवस्था

अदालत का वर्तमान रुख शांतिपूर्ण विरोध के मौलिक अधिकार और निवासियों व यात्रियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के उसके लंबे समय से चले आ रहे प्रयासों को दर्शाता है। बेंच ने 2018 के अपने अवलोकनों को याद किया, जिसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि विरोध का अधिकार आवश्यक है, लेकिन इसे सार्वजनिक सड़कों और स्थानों पर अनिश्चितकालीन कब्ज़े को रोकने के लिए नामित स्थानों पर ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

यह संतुलन 2020 में शाहीन बाग विरोध प्रदर्शनों के संबंध में दिए गए फैसले में भी उजागर हुआ था, जहां अदालत ने फैसला सुनाया था कि मौलिक अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं और उन्हें जनता के सड़कों तक स्पष्ट पहुंच के अधिकार के साथ सह-अस्तित्व में होना चाहिए। जैसे ही सरकार अपनी प्रतिक्रिया तैयार करती है, मुख्य ध्यान एक ऐसी रूपरेखा स्थापित करने पर है जो लोकतांत्रिक असहमति के अधिकार का सम्मान करते हुए सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखे। अगले कदम में सरकार की आधिकारिक अदालत में प्रतिक्रिया शामिल होगी, जो यह स्पष्ट कर सकती है कि राष्ट्रीय राजधानी में भविष्य के प्रदर्शनों के लिए विशिष्ट दिशानिर्देश या पूर्ण स्थानांतरण योजना लागू की जाएगी या नहीं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.