सुप्रीम कोर्ट ने साल 2023 के इलेक्शन कमिश्नर नियुक्ति कानून की समीक्षा शुरू कर दी है। सितंबर 2026 में आए स्प्लिट वर्डिक्ट (Split Verdict) के बाद अब मामला बड़ी कॉन्स्टिट्यूशन बेंच को सौंपा गया है, साथ ही अधिकारियों को मिली इम्यूनिटी पर भी कोर्ट ने नोटिस जारी किया है।
भारत के चुनाव आयोग (Election Commission) के कामकाज और नियुक्ति प्रक्रिया पर कानूनी घेरा गहराता जा रहा है। अक्टूबर 2026 के मध्य में, न्यायपालिका 2023 के उस एक्ट की वैधता को परख रही है, जिसने चीफ इलेक्शन कमिश्नर और अन्य आयुक्तों को चुनने का पूरा तरीका बदल दिया था। सितंबर 23, 2026 को दो जजों की बेंच में इस पर राय बंटी हुई थी, जिसके बाद अब इसे एक बड़ी कॉन्स्टिट्यूशन बेंच के पास भेजा गया है ताकि फाइनल फैसला लिया जा सके।
नियुक्ति समिति पर उठा सवाल
विवाद का केंद्र सिलेक्शन कमेटी की बनावट है। नए कानून के तहत समिति में प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। आलोचकों और याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस संरचना में न्यायपालिका की भूमिका कम हो गई है और एग्जीक्यूटिव के बहुमत में होने के कारण आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। कोर्ट अब यह तय करेगा कि क्या यह व्यवस्था स्वतंत्र नियामक संस्थाओं (Independent Regulatory Bodies) के संवैधानिक मानकों पर खरी उतरती है।
इम्यूनिटी पर भी नोटिस
मामले को और जटिल बनाते हुए, 13 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को एक नया नोटिस जारी किया है। यह नोटिस 2023 के एक्ट की सेक्शन 16 को चुनौती देता है, जो चुनाव आयोग के अधिकारियों को सिविल और क्रिमिनल कार्यवाही से छूट (Immunity) देता है। कोर्ट अब यह जांच रहा है कि क्या यह 'ब्लैंकेट इम्यूनिटी' संवैधानिक दायरे में है या नहीं।
निवेशकों और बाजार के लिए महत्व
हालांकि यह कोई कॉर्पोरेट या स्टॉक-विशिष्ट घटना नहीं है, लेकिन देश की संस्थागत आजादी और विश्वसनीयता किसी भी अर्थव्यवस्था के बिजनेस और रेगुलेटरी माहौल के लिए बेहद जरूरी है। निवेशक हमेशा एक स्पष्ट, निष्पक्ष और स्थिर चुनावी प्रक्रिया को प्राथमिकता देते हैं, क्योंकि यह लंबी अवधि की राजनीतिक स्थिरता की नींव है। अब सबकी निगाहें चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया पर हैं, जो इस मामले की सुनवाई के लिए कॉन्स्टिट्यूशन बेंच का गठन करेंगे।
