सुप्रीम कोर्ट इस समय Central Government Health Scheme (CGHS) के **267** कर्मचारियों से जुड़े लेबर विवाद की सुनवाई कर रहा है। मामला **2006** से काम कर रहे इन कर्मचारियों को परमानेंट करने और **2006** से **2019** के बीच के बकाया वेतन (Back Wages) को लेकर है।
क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट उन 267 कर्मचारियों की याचिका पर विचार कर रहा है जो 2006 से CGHS में एडमिनिस्ट्रेटिव काम कर रहे हैं। इन कर्मचारियों को अलग-अलग प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर्स के जरिए रखा गया था। निचली अदालतों और लेबर कोर्ट ने पहले ही इन कॉन्ट्रैक्ट्स को 'शैम एंड कैमॉफ्लाज' (Sham and Camouflage) करार दिया है, क्योंकि इन पर सीधा कंट्रोल सरकारी अधिकारियों का था। अदालत का मानना है कि कॉन्ट्रैक्टर्स का उपयोग केवल लेबर कानूनों से बचने के लिए किया गया था।
कानूनी लड़ाई का केंद्र
दिल्ली हाई कोर्ट ने कर्मचारियों को रेगुलराइज तो कर दिया, लेकिन बैक वेजेस की सीमा अगस्त 2019 (लेबर कोर्ट के फैसले की तारीख) तक ही तय की। अब कर्मचारी सुप्रीम कोर्ट में अपील कर रहे हैं कि उन्हें 2006 से पूरी फाइनेंशियल राहत मिलनी चाहिए।
मार्केट और सरकारी विभागों पर असर
यह मामला सरकार की आउटसोर्सिंग नीतियों पर बड़े सवाल खड़े करता है। यदि कोर्ट का फैसला कर्मचारियों के पक्ष में मजबूती से आता है, तो:
- सरकारी विभागों को अपनी हायरिंग और कॉन्ट्रैक्ट प्रक्रिया पूरी तरह बदलनी पड़ सकती है।
- स्टाफिंग और फैसिलिटी मैनेजमेंट कंपनियों के लिए कंप्लायंस लागत बढ़ सकती है।
- सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स में भविष्य में और अधिक सख्त शर्तें शामिल की जा सकती हैं, जो सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों के मार्जिन को प्रभावित कर सकती हैं।
