सुप्रीम कोर्ट पूर्व तेहलका संपादक तरुण तेजपाल की अपील पर सुनवाई कर रहा है कि क्या उन्हें औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण किए बिना अपनी सजा के खिलाफ अपील जारी रखने की अनुमति दी जा सकती है। गोवा सरकार का तर्क है कि प्रक्रियात्मक नियमों के तहत अपील स्वीकार्य नहीं है, जबकि बचाव पक्ष हाई कोर्ट से मिली राहत का हवाला दे रहा है। अब बेंच ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
तरुण तेजपाल की अपील पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
भारत के सर्वोच्च न्यायालय में पूर्व तेहलका संपादक तरुण तेजपाल की 2013 के रेप केस में सजा के खिलाफ दायर अपील की स्वीकार्यता (maintainability) पर सुनवाई चल रही है। 24 अगस्त, 2026 को हुई इस सुनवाई में, गोवा सरकार और बचाव पक्ष के बीच इस बात पर प्रक्रियात्मक विवाद पर ध्यान केंद्रित किया गया कि क्या अपीलकर्ता को अपील सुनने से पहले हिरासत में आत्मसमर्पण करना होगा।
गोवा सरकार का पक्ष
गोवा सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि तरुण तेजपाल को सुप्रीम कोर्ट से विशेष छूट (exemption) मांगे बिना या औपचारिक रूप से आत्मसमर्पण किए अपील आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। सरकार का रुख प्रक्रियात्मक नियमों की व्याख्या पर आधारित है, जो बताता है कि अपील प्रक्रिया को बनाए रखने के लिए यह अनुपालन एक पूर्व शर्त है।
बचाव पक्ष की दलील
वहीं, तरुण तेजपाल की ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल ने इस आवश्यकता पर आपत्ति जताई। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि बॉम्बे हाई कोर्ट ने पहले ही आत्मसमर्पण से चार सप्ताह की राहत प्रदान की थी, जो अभी भी प्रभावी है। बचाव पक्ष का कहना था कि यह मौजूदा राहत को देखते हुए, अपील प्रक्रिया के इस चरण में तत्काल आत्मसमर्पण की कोई आवश्यकता नहीं है।
अदालत का अगला कदम
मामले की सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने आत्मसमर्पण से छूट की याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। यह कानूनी निर्धारण महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मामले की निरंतरता के लिए प्रक्रियात्मक मार्ग तय करेगा।
सजा बढ़ाने की मांग
इस प्रक्रियात्मक चुनौती से परे, मामले में महत्वपूर्ण कानूनी विकास शामिल हैं। गोवा सरकार ने तेजपाल को हाई कोर्ट द्वारा सुनाई गई 10 साल की कठोर कारावास की सजा को बढ़ाने की मांग करते हुए भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। राज्य का तर्क है कि वर्तमान सजा अपराधों की गंभीरता के अनुपात में नहीं है और वह आजीवन कारावास की मांग कर रहा है। अपीलकर्ता के लिए कानूनी जोखिम इस संभावना में निहित है कि यदि सुप्रीम कोर्ट छूट की याचिका को अस्वीकार कर देता है तो उसे तत्काल कैद का सामना करना पड़ सकता है, साथ ही राज्य द्वारा उसकी सजा की अवधि बढ़ाने की चल रही चुनौती भी है।
