सम्भल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर ली है। कोर्ट का आगामी फैसला यह तय करेगा कि धार्मिक स्थलों के विवादों में 1991 का 'प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट' कैसे लागू होगा। यह निर्णय देशभर में प्रॉपर्टी और रियल एस्टेट से जुड़े कानूनी मामलों के लिए बेहद अहम है।
कानूनी दांव-पेच और विवाद
सम्भल, उत्तर प्रदेश की शाही जामा मस्जिद के सर्वे का मामला अब निर्णायक मोड़ पर है। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने निचली अदालत के सर्वे आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर लंबी बहस सुनी। इस केस का मुख्य आधार 1991 का 'प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट' है, जो 15 अगस्त 1947 की स्थिति के अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल के स्वरूप को सुरक्षित रखता है।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
शाही जामा मस्जिद कमेटी के वकीलों ने तर्क दिया कि निचली अदालत का सर्वे आदेश कानून के दायरे से बाहर है। उन्होंने दिसंबर 2024 के सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का हवाला दिया, जिसमें धार्मिक स्थलों से जुड़ी नई याचिकाओं पर रोक लगाई गई थी। वहीं, दूसरी तरफ सर्वे की मांग करने वाले पक्ष का दावा है कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, 1526 में इस स्थल पर हरिहर मंदिर था, जिसे ढहाया गया था। इस आधार पर उन्होंने न्यायिक जांच की मांग रखी है।
सरकार का रुख और रियल एस्टेट पर असर
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने स्पष्ट किया कि सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है और प्रॉपर्टी विवाद में तटस्थ रहेगी।
निवेशकों और रियल एस्टेट सेक्टर के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसे संवेदनशील विवादों से स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में अस्थिरता पैदा होती है। अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया था। अब कोर्ट का फाइनल वर्डिक्ट देशभर की निचली अदालतों के लिए एक नजीर बनेगा, जिससे प्रॉपर्टी टाइटल से जुड़े जोखिम और कानूनी देरी को कम करने में मदद मिल सकती है।
