सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमी लेयर क्राइटेरिया में बदलाव लागू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा मांगी गई **2 साल** की मोहलत पर फैसला सुरक्षित रख लिया है। सरकार का कहना है कि मार्च **2026** के फैसले को तुरंत लागू करने से सरकारी नौकरियों और सर्विस एलोकेशन में भारी प्रशासनिक अस्थिरता पैदा हो सकती है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली है, जिसमें मार्च 2026 के उस फैसले को लागू करने के लिए 2 साल का समय मांगा गया है, जिसमें सैलरी और कृषि आय को क्रीमी लेयर की गणना से बाहर करने का आदेश दिया गया था।\n\n### प्रशासनिक संकट का डर\nसरकार ने कोर्ट को आगाह किया है कि अगर इस नए नियम को तत्काल लागू किया जाता है, तो सरकारी विभागों में हड़कंप मच सकता है। यह बदलाव साल 2012 से चली आ रही भर्ती प्रक्रियाओं और सर्विस एलोकेशन को प्रभावित करेगा। इसका सीधा असर Indian Railways, Department of Posts, बैंकिंग सेक्टर और पैरामिलिट्री फोर्सेस जैसे बड़े नियोक्ताओं पर पड़ सकता है।\n\n### विवाद की जड़ क्या है?\nयह विवाद Department of Personnel and Training (DoPT) की पुरानी नीतियों में विसंगति से जुड़ा है। साल 1993 के मेमोरेंडम में सैलरी और कृषि आय को क्रीमी लेयर से बाहर रखने की बात थी, लेकिन साल 2004 के एक स्पष्टीकरण ने PSU कर्मचारियों के बच्चों को रिजर्वेशन से बाहर कर दिया, जबकि सरकारी कर्मचारियों को छूट मिलती रही। मार्च के फैसले में कोर्ट ने इसे भेदभावपूर्ण माना था।\n\n### आगे की राह\nप्रभावित उम्मीदवारों के वकीलों ने सरकार की इस मांग का विरोध करते हुए इसे टालमटोल की रणनीति बताया है। अब निवेशकों और मार्केट पार्टिसिपेंट्स की नजर इस बात पर है कि क्या कोर्ट तुरंत अनुपालन का आदेश देता है या सरकार को चरणबद्ध तरीके से (Phased implementation) बदलाव करने की अनुमति देता है।
