सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों से ज्यादा होने पर स्थानीय चुनाव लड़ने पर लगी रोक को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है। कोर्ट ने कहा कि अब भारत की प्रजनन दर (TFR) घटकर **1.9** रह गई है, ऐसे में पुरानी आबादी नियंत्रण की नीतियां बेमानी हो गई हैं।
कानून पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने 4 नवंबर 2026 को एक ऐतिहासिक रुख अपनाते हुए दो बच्चों की नीति के आधार पर चुनाव लड़ने पर लगी रोक को चुनौती दी है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने महाराष्ट्र के एक पूर्व सरपंच की अयोग्यता को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। सरपंच को महाराष्ट्र विलेज पंचायत एक्ट, 1959 के तहत दो बच्चों के नियम के चलते पद से हटाया गया था।
क्यों पुरानी हो गई ये नीति?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत की डेमोग्राफिक हकीकत बदल चुकी है। देश की कुल प्रजनन दर (TFR) अब 1.9 पर आ गई है, जो रिप्लेसमेंट लेवल 2.1 से भी कम है। कोर्ट ने कहा कि 2003 के 'जावेद बनाम हरियाणा राज्य' मामले में जो फैसला जनसंख्या विस्फोट के डर को आधार मानकर दिया गया था, वह अब प्रासंगिक नहीं रहा क्योंकि अब देश ओवरपॉपुलेशन के बजाय गिरती जनसंख्या की चुनौतियों की ओर बढ़ रहा है।
संविधान और लोकतांत्रिक अधिकार
बेंच ने साफ कहा कि राजनीतिक उम्मीदवारी को परिवार के आकार से जोड़ना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली 'रिप्रोडक्टिव ऑटोनॉमी' (प्रजनन स्वायत्तता) के खिलाफ है। कोर्ट के अनुसार, किसी व्यक्ति की सरकारी पद के लिए योग्यता उसके बच्चों की संख्या से तय नहीं होनी चाहिए।
भविष्य के लिए क्या हैं संकेत?
यह फैसला भारत की पॉलिसी के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत है। अब सरकार को बढ़ती उम्र की आबादी, गिरते वर्कफोर्स और बुजुर्गों की देखभाल पर ध्यान देने की जरूरत है। इस मामले को अब एक बड़ी संवैधानिक बेंच के पास भेज दिया गया है, जो देशभर में लागू ऐसे एलिजिबिलिटी बैरियर्स की वैधता पर अंतिम फैसला लेगी।
