Supreme Court ने केंद्र और Election Commission को नोटिस जारी कर उस परंपरा पर सवाल उठाए हैं, जिसमें विधायक इस्तीफा देकर अपना दल बदलते हैं। यह कदम 'Anti-Defection Law' के लूपहोल को बंद करने की दिशा में एक बड़ा कानूनी हस्तक्षेप माना जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने उन विधायकों के खिलाफ एक कानूनी जांच शुरू कर दी है जो राजनीतिक दल बदलने के लिए पहले अपने पद से इस्तीफा दे देते हैं। यह मामला मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले के बाद चर्चा में आया, जिसमें AIADMK के 6 विधायकों के इस्तीफे पर दर्ज शिकायत को खारिज कर दिया गया था। ये विधायक बाद में Tamilaga Vettri Kazhagam में शामिल हो गए थे।
कानून का लूपहोल
बहस का मुख्य केंद्र संविधान की 'दसवीं अनुसूची' (Tenth Schedule) है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि 'Anti-Defection Law' से बचने के लिए विधायक अयोग्यता की कार्यवाही शुरू होने से पहले ही इस्तीफा दे देते हैं। इस्तीफा देने के बाद, वे अपना रिकॉर्ड साफ कर लेते हैं और नई पार्टी के टिकट पर तुरंत उपचुनाव लड़ते हैं। यह पूरी प्रक्रिया कानून की मूल भावना को ही शून्य कर रही है।
गवर्नेंस और अर्थव्यवस्था पर असर
इस मामले के दो गंभीर पहलू हैं:
- सरकारी खजाने पर बोझ: हर इस्तीफे के बाद उपचुनाव कराना पड़ता है, जिसका पूरा खर्च जनता के टैक्स के पैसे से होता है। यह खर्च किसी नीतिगत जरूरत के बजाय विधायकों के निजी राजनीतिक फैसलों की वजह से होता है।
- राजनीतिक अस्थिरता: तमिलनाडु जैसे राज्यों में, जहां विधानसभाओं में गणित काफी नाजुक होता है, वहां इस तरह के दलबदल से सरकार की स्थिरता पर सीधा असर पड़ता है। इससे राज्य की पॉलिसी मेकिंग और फैसलों में देरी होने का रिस्क बना रहता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह सक्रियता चुनावी अखंडता को बनाए रखने के लिए बेहद अहम है। अब बाजार की नजरें केंद्र सरकार और Election Commission के जवाब पर टिकी हैं, जो इस पूरे मामले का भविष्य तय करेंगे।
