सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस के उस नोटिस को रद्द कर दिया है जिसमें X (Twitter) से पत्रकार अभिषेक उपाध्याय का विस्तृत डिजिटल डेटा मांगा गया था। कोर्ट ने इसे 'अत्यधिक कदम' करार दिया और पत्रकार को गिरफ्तारी से स्थायी सुरक्षा प्रदान की है।
डिजिटल प्राइवेसी पर ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने डिजिटल प्राइवेसी और जांच की सीमाओं को लेकर एक निर्णायक रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने गाजियाबाद पुलिस द्वारा X को भेजे गए उस नोटिस को खारिज कर दिया, जिसमें पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के डिजिटल फुटप्रिंट्स मांगे गए थे। कोर्ट ने पुलिस की इस मांग को 'अत्यधिक कदम' (Excessive Measure) और एक तरह का 'ओवरकिल' बताया।
क्या थी पुलिस की मांग?
पुलिस ने 22 अगस्त, 2026 को जारी नोटिस में पत्रकार के अकाउंट से जुड़ी व्यापक जानकारी मांगी थी। कोर्ट ने गौर किया कि पुलिस उस समय का डेटा मांग रही थी, जो कथित सड़क हादसे की घटना से 3 महीने पहले का था। कोर्ट ने साफ कहा कि जांच एजेंसियां किसी खास अपराध से असंबंधित व्यक्तिगत डेटा हासिल करने के लिए व्यापक निगरानी का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं।
गिरफ्तारी से मिली राहत
इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार को गिरफ्तारी से मिली अंतरिम सुरक्षा को स्थायी (Absolute) कर दिया है। साथ ही, याचिकाकर्ता को FIR को चुनौती देने के लिए संबंधित हाई कोर्ट जाने की छूट दी गई है।
जांच का दायरा और नई गाइडलाइंस
यह फैसला डिजिटल युग में पुलिस की कार्यप्रणाली के लिए एक नजीर बन सकता है। कोर्ट ने संकेत दिया है कि भविष्य में पुलिस के लिए डिजिटल साक्ष्य जुटाने हेतु अनिवार्य गाइडलाइंस बनाई जा सकती हैं। फिलहाल, स्पष्ट नियमों के अभाव में टेक कंपनियां और आम नागरिक अक्सर मुश्किल स्थिति में फंस जाते हैं। कोर्ट की यह सख्ती यह सुनिश्चित करने के लिए है कि भविष्य में अधिकारी सोशल मीडिया डेटा के नाम पर मनमानी न कर सकें और जांच का दायरा केवल घटना तक ही सीमित रहे।
