सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के चलते लगाई गई पाबंदियों पर सुनवाई को 15 अक्टूबर तक स्थगित कर दिया है। इसी बीच, दिल्ली के व्यापारियों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है और विरोध प्रदर्शन के दौरान हुए कामकाज ठप होने से करीब ₹2,000 करोड़ के नुकसान का दावा किया है।
कोर्ट की अगली कार्रवाई
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत कर रहे हैं, ने सुनवाई को 15 अक्टूबर, 2026 तक के लिए टाल दिया है। इसका मुख्य कारण बेंच की सदस्य जस्टिस वी. मोहना की अस्वस्थता है। अदालत ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को बुधवार शाम तक अवमानना याचिकाओं (Contempt Petitions) पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
विवाद की जड़ क्या है?
यह कानूनी विवाद मुख्य रूप से 10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक परिवहन सेवाओं, जैसे मेट्रो और ट्रेनों के निलंबन से जुड़ा है। याचिकर्ताओं का तर्क है कि इस तरह की व्यापक पाबंदियों से लोगों की आवाजाही के अधिकारों का उल्लंघन हुआ और जरूरी सेवाएं प्रभावित हुईं। इसके अलावा, अवैध हिरासत और पुलिस की कार्यप्रणाली के आरोपों पर भी अदालत गौर कर रही है।
कारोबार पर मार
जहां सुप्रीम कोर्ट इस मामले के संवैधानिक और नियामक पहलुओं को देख रहा है, वहीं दिल्ली के व्यापारी वर्ग ने दिल्ली हाई कोर्ट में अपनी व्यथा रखी है। व्यापारियों का कहना है कि ट्रांजिट हब बंद होने और बैरिकेडिंग के कारण ग्राहकों और कर्मचारियों का बाजार तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। इस वजह से उन्हें करीब ₹2,000 करोड़ के व्यापारिक नुकसान का सामना करना पड़ा है।
अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार ट्रांसपोर्ट निर्देशों के अनुपालन पर क्या जवाब देती है और क्या अदालतें आम जनजीवन व आर्थिक गतिविधियों को सुचारू बनाने के लिए कोई अंतरिम राहत देती हैं।
