सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की गई है, जिसमें चीफ इलेक्शन कमिश्नर (CEC) Gyanesh Kumar के कामकाज के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में आरोप लगाया गया है कि CEC ने 'Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023' का उल्लंघन करते हुए तीन सदस्यीय आयोग की सहमति के बिना एकतरफा फैसले लिए हैं।
सुप्रीम कोर्ट में वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर की गई यह याचिका चुनाव आयोग के भीतर फैसले लेने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि कानून के तहत CEC 'बराबर वालों में प्रथम' (first among equals) हैं और उनके पास अन्य चुनाव आयुक्तों की राय को दरकिनार करने का अधिकार नहीं है।
विवाद की जड़: 2023 का कानून
याचिका में दावा किया गया है कि चुनावी रोल के सॉफ्टवेयर अपडेट और गाइडलाइंस को तब लागू किया गया, जब इलेक्शन कमिश्नर Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने लिखित में आपत्ति जताई थी।
प्रमुख आरोप और चिंताएं:
- गोवा का मामला: डिजिटल सिस्टम की खराबी के कारण 97 योग्य मतदाताओं के नाम बहाल नहीं किए गए।
- पश्चिम बंगाल का मामला: न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए मतदाताओं के खिलाफ आयोग के नाम पर 16.10 लाख से ज्यादा अपीलें की गईं, वह भी बिना अन्य आयुक्तों की सहमति के।
- फॉर्म 6 में बदलाव: मतदाता पंजीकरण के लिए नए नियम लागू किए गए, जिसमें पूर्वजों के विवरण की मांग की गई, जबकि इसके लिए कोई वैधानिक संशोधन नहीं किया गया था।
- IT डिवीजन में बदलाव: 28 जुलाई को IT डिवीजन की जिम्मेदारियों में फेरबदल का आदेश अन्य आयुक्तों के विरोध के बावजूद पारित कर दिया गया।
याचिका में अब कोर्ट से मांग की गई है कि इन एकतरफा फैसलों को असंवैधानिक घोषित किया जाए। साथ ही, 1 अक्टूबर 2025 से लेकर अब तक के सर्वर लॉग्स और डेटा को सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है, ताकि इस पूरे मामले की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो सके।
