सुप्रीम कोर्ट ने GST अधिकारियों को एडवोकेट पुनीत बत्रा के दफ्तर से जब्त किए गए डेटा की जांच करने से तत्काल प्रभाव से रोक दिया है। कोर्ट ने **28 सितंबर** तक अंतरिम राहत दी है, ताकि क्लाइंट-अटॉर्नी गोपनीयता सुरक्षित रह सके।
कोर्ट का रुख और डेटा पर रोक
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने GST विभाग को निर्देश दिया है कि 28 सितंबर को अगली सुनवाई होने तक जब्त की गई सामग्री (सीज्ड मटेरियल) का विश्लेषण या उस पर कोई भी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए। यह मामला टैक्स अधिकारियों की छापेमारी और उनकी जांच की सीमाओं पर एक बड़ी बहस छेड़ता है।
क्या है विवाद की जड़?
इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या टैक्स अधिकारी किसी पेशेवर (जैसे वकील) के दफ्तर में छापेमारी के दौरान जब्त किए गए डिजिटल उपकरणों की जांच कर सकते हैं, बिना 'अटॉर्नी-क्लाइंट प्रिविलेज' का उल्लंघन किए? कानूनी तौर पर, वकील और क्लाइंट के बीच की बातचीत पूरी तरह गोपनीय होती है और इसे सरकारी जांच सहित किसी भी बाहरी व्यक्ति से सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
बचाव पक्ष और GST विभाग के तर्क
वकील के कानूनी सलाहकारों का कहना है कि जब्त हार्डवेयर में कई क्लाइंट्स का बेहद संवेदनशील डेटा है, जिसे सार्वजनिक करना या जांच में शामिल करना मुवक्किलों के हितों के लिए खतरनाक हो सकता है। वहीं, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने सफाई देते हुए कहा कि जांच पूरी तरह कानूनी दायरे में थी और इसका उद्देश्य गोपनीयता का उल्लंघन करना नहीं था।
हालांकि, बेंच ने गोपनीयता के संभावित उल्लंघन को देखते हुए स्टेटस को (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया है। अब 28 सितंबर की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका असर भविष्य में चार्टर्ड अकाउंटेंट्स, वकीलों और अन्य पेशेवरों के खिलाफ होने वाली जांच की प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है।
