चुनाव आयोग (Election Commission of India) के कामकाज और पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इसमें इंटरनल मतभेदों और वोटर लिस्ट में डेटा गड़बड़ियों का हवाला देते हुए स्वतंत्र ऑडिट की मांग की गई है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर इस PIL को एडवोकेट विशाल तिवारी ने दाखिल किया है। याचिका में मांग की गई है कि एक गैर-पक्षपाती कमेटी का गठन किया जाए जो चुनाव आयोग की प्रशासनिक कार्यप्रणाली और चुनावी अखंडता की समीक्षा करे।\n\n### अंदरूनी कलह और प्रशासनिक सवाल\n\nयाचिका में आयोग के भीतर चल रहे कथित मतभेदों का जिक्र किया गया है। इसमें आरोप है कि चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार द्वारा लिए गए कई एकतरफा फैसलों पर चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने असहमति जताई थी। ये आपत्तियां मुख्य रूप से फॉर्म 6 में बदलाव और चुनावी डेटाबेस के सेंट्रलाइजेशन (Centralization) को लेकर थीं। हालांकि आयोग इसे एक सामान्य प्रक्रिया मानता है, लेकिन याचिकाकर्ता का कहना है कि प्रशासन में पारदर्शिता की कमी एक बड़ी चिंता का विषय है।\n\n### डेटा मैनेजमेंट में बड़ी खामियां\n\nयाचिका में आंकड़ों की सटीकता पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं:\n* पश्चिम बंगाल: करीब 38 लाख लोगों की वोटर लिस्ट से नाम हटने की अपीलें अभी तक पेंडिंग हैं।\n* महाराष्ट्र: डेटा एंट्री की बड़ी चूक सामने आई है, जहां 2.7 लाख से अधिक लोगों की उम्र 101 से 150 वर्ष के बीच दर्ज कर दी गई है।\n\nइसी के चलते याचिकाकर्ता ने साइबर सुरक्षा और संवैधानिक कानून के विशेषज्ञों से इसकी ऑडिट कराने की मांग की है।\n\n### चुनावी भाषणों पर नियंत्रण\n\nप्रशासनिक मुद्दों के अलावा, याचिका में राजनीतिक अभियानों के दौरान भड़काऊ भाषणों (Communal Rhetoric) को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट से सख्त दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है। याचिका का कहना है कि इसका मकसद किसी पुराने चुनाव परिणाम को चुनौती देना नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्था की नींव को मजबूत करना है। अब सभी की निगाहें कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं, जो भविष्य में चुनाव आयोग की कार्यशैली को प्रभावित कर सकती है।
