Supreme Court ने एक अहम आदेश में साफ कर दिया है कि पेंडिंग मुकदमे अब म्युनिसिपल अथॉरिटीज को अवैध संपत्तियों को सील करने से नहीं रोक पाएंगे। उन कंपनियों पर गाज गिरना तय है जो आवासीय इलाकों (Residential Zones) में बिना मंजूरी के कमर्शियल काम चला रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सख्ती दिखाते हुए स्पष्ट किया है कि प्रॉपर्टी मालिक अब पेंडिंग लिटिगेशन (pending litigation) का सहारा लेकर म्युनिसिपल कार्रवाई से नहीं बच सकते। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने साफ कहा है कि जो प्रॉपर्टीज लैंड-यूज नियमों का उल्लंघन कर रही हैं, उन पर कार्रवाई तत्काल प्रभाव से की जाएगी, भले ही मामला कोर्ट में विचाराधीन हो।
बिजनेस पर क्या होगा असर?
निवेशकों के लिए यह एक बड़ी चेतावनी है। रिटेल चेन, रेस्टोरेंट और को-वर्किंग स्पेस चलाने वाली ऐसी कई कंपनियां हैं जो अक्सर रिहायशी इलाकों से अपना कारोबार ऑपरेट करती हैं। पहले ये कंपनियां कानूनी विवादों का हवाला देकर सीलिंग की कार्रवाई को टाल देती थीं, लेकिन अब ऐसा करना नामुमकिन होगा। इससे उन कंपनियों के लिए ऑपरेशनल रिस्क बढ़ गया है जो नियमों का पूरी तरह पालन नहीं कर रही हैं।
मनमानी कार्रवाई पर रोक
कोर्ट ने 'पिक एंड चूज' यानी चुनिंदा संपत्तियों को निशाना बनाने की म्युनिसिपल अथॉरिटीज की आदत पर भी लगाम लगाई है। बेंच ने साफ चेतावनी दी है कि प्रशासन को निष्पक्ष तरीके से काम करना होगा, क्योंकि अब पूरी प्रक्रिया की निगरानी सीधे सुप्रीम कोर्ट कर रहा है।
निवेशकों के लिए बड़ी डेडलाइन
सभी म्युनिसिपल निकायों को 23 नवंबर 2026 तक अपना स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल करना है। निवेशकों को सलाह है कि वे उन कंपनियों पर नजर रखें जिनका बड़ा फिजिकल फुटप्रिंट आवासीय क्षेत्रों में है। अगर नियमों का उल्लंघन पाया गया, तो इन कंपनियों को अचानक अपनी ब्रांच बंद करनी पड़ सकती है या रिलोकेट (relocate) होना पड़ सकता है। हालांकि, जिन इलाकों में लैंड-यूज को लेकर विवाद है, वहां कोर्ट ने कुछ राहत दी है, लेकिन प्राथमिकता रेजिडेंशियल एरिया को वापस लाने की ही है।
