सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार से इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) के खिलाफ जवाब मांगा है। आरोप है कि संस्थान गरीब मरीजों को अनिवार्य मुफ्त इलाज मुहैया कराने में विफल रहा है।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को एक औपचारिक नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उस याचिका के जवाब में आया है जिसमें आरोप लगाया गया है कि इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य जिम्मेदारियों को पूरा नहीं कर रहा है। अदालत इस दावे की जांच कर रही है कि संस्थान ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के मरीजों को अनिवार्य मुफ्त इलाज नहीं दिया है, जो कि रियायती दरों पर मिली जमीन के बदले एक आवश्यक शर्त थी।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ILBS एक स्वायत्त, सरकारी संस्थान है और इसका शेयर बाजार से कोई लेना-देना नहीं है। यह कानूनी हस्तक्षेप मुख्य रूप से सार्वजनिक जवाबदेही और वित्तीय सुशासन पर केंद्रित है।
वित्तीय प्रबंधन पर उठे गंभीर सवाल
अदालत में पेश की गई याचिका में संस्थान के वित्तीय कामकाज पर गंभीर प्रश्न उठाए गए हैं। वर्ष 2018 और 2023 की CAG रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए, फाइलिंग में सार्वजनिक धन के कुप्रबंधन का दावा किया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ₹36 करोड़ से अधिक के बकाया आकस्मिक अग्रिम (contingency advances) और लगभग ₹9.68 करोड़ मूल्य के अनुपयोगी उपकरणों (non-serviceable equipment) को लेकर चिंता जताई गई है।
इसके अलावा, याचिका में आरोप लगाया गया है कि संस्थान की फाइनेंस कमेटी की बैठक पिछले 3 वर्षों से नहीं हुई है। एक अन्य विवादित बिंदु लगभग ₹68 करोड़ का कॉर्पस फंड है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह फिक्स्ड डिपॉजिट में फंसा हुआ है, जबकि इसे सरकारी खजाने में वापस जमा करने की सिफारिश की गई थी।
इलाज का कोटा और अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट के 2018 के निर्देश के तहत, रियायती जमीन पाने वाले अस्पतालों के लिए यह अनिवार्य है कि वे 10% इनपेशेंट बेड और 25% ओपीडी सेवाएं EWS मरीजों के लिए आरक्षित रखें। अदालत अब यह जांच रही है कि क्या ILBS इन कोटे का पालन कर रहा है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर, 2026 के लिए निर्धारित की है।
