दिल्ली के Connaught Place में हालिया विरोध प्रदर्शनों के कारण हुए कामकाज के नुकसान पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई है। कोर्ट ने संकेत दिया है कि अगर प्रशासनिक पाबंदियां जरूरत से ज्यादा थीं, तो व्यापारियों को हर्जाना मिल सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने व्यापारिक अधिकारों और प्रशासनिक पाबंदियों के बीच एक बड़ा कानूनी संतुलन बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए, चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने साफ कर दिया है कि अगर New Delhi Municipal Council (NDMC) की कार्रवाई 'डिस्पोरशनेट' (असंतुलित) पाई जाती है, तो प्रभावित व्यापारियों को मुआवजा मिल सकता है।
कारोबार को हुआ कितना नुकसान?
दिल्ली किराना कमेटी और दिल्ली आयरन एंड हार्डवेयर मर्चेंट एसोसिएशन का दावा है कि इन प्रदर्शनों और बंदी के कारण रोजाना लगभग ₹200 करोड़ का व्यापार ठप हो गया था। कोर्ट ने अभी कोई अंतरिम आदेश तो नहीं दिया है, लेकिन 'कॉन्स्टिट्यूशनल टॉर्ट ज्यूरिसडिक्शन' (Constitutional Tort Jurisdiction) के तहत सरकार या स्थानीय निकायों को जिम्मेदार ठहराने की संभावना जताकर एक नई नजीर पेश की है।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद 'Cockroach Janta Party' द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शनों के बाद शुरू हुआ, जिसके केंद्र में सौरव दास और आशुतोष रांका जैसे सदस्यों की हिरासत थी। इस प्रोटेस्ट के कारण सेंट्रल पार्क और आसपास के इलाकों को सील करना पड़ा, जिससे छोटे दुकानदारों की रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ा है।
कोर्ट अब 26 या 27 अक्टूबर को फिर से इस मामले की सुनवाई करेगा। तब यह तय होगा कि क्या प्रशासन द्वारा लगाई गई पाबंदियां वाकई जरूरी थीं या व्यापारियों को उनकी आर्थिक हानि के लिए सरकार से हर्जाना दिलाया जाएगा।
