सुप्रीम कोर्ट ने Indian Oil Corporation को एक महिला उम्मीदवार को नौकरी देने से मना करने पर **₹12 लाख** का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कंपनी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि महिलाएं एलपीजी सिलेंडर नहीं उठा सकतीं।
सुप्रीम कोर्ट ने Indian Oil Corporation Limited (IOCL) को निर्देश दिया है कि वह उस महिला उम्मीदवार को ₹12 लाख का हर्जाना दे, जिसे जेंडर के आधार पर नौकरी देने से इनकार कर दिया गया था। कंपनी ने तर्क दिया था कि बॉटलिंग प्लांट में रिफिलिंग हेल्पर की भूमिका के लिए एलपीजी सिलेंडर उठाने पड़ते हैं, इसलिए महिला उम्मीदवार इसके लिए उपयुक्त नहीं है। कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह नकार दिया और इसे भेदभावपूर्ण व समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करार दिया।
निवेशकों के लिए क्यों है यह जरूरी?
आर्थिक रूप से देखें तो यह जुर्माना कंपनी के बड़े मुनाफे और विशाल स्तर के सामने बेहद छोटा है। लेकिन, यह फैसला कॉर्पोरेट गवर्नेंस और ह्यूमन कैपिटल मैनेजमेंट के नजरिए से एक बड़ा संकेत है। आज के दौर में इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स ESG (एनवायरनमेंटल, सोशल एंड गवर्नेंस) मानकों पर बहुत बारीकी से नजर रखते हैं। इस तरह की भेदभावपूर्ण भर्ती प्रक्रिया से कंपनी की साख (Reputation) पर बुरा असर पड़ता है और कानूनी विवाद कोर बिजनेस ऑपरेशंस से ध्यान भटका सकते हैं।
आगे की राह
एक बड़ी पब्लिक सेक्टर कंपनी होने के नाते, IOCL से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी एचआर (HR) पॉलिसी को आधुनिक और संवैधानिक बनाए। कोर्ट की इस फटकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शारीरिक फिटनेस की शर्तें काम से संबंधित और उद्देश्यपूर्ण होनी चाहिए, न कि जेंडर को लेकर पुरानी धारणाओं पर आधारित। निवेशकों के लिए यह जरूरी है कि वे देखें कि कैसे कंपनियां अपनी गवर्नेंस कमियों को सुधारती हैं, ताकि लंबी अवधि में रिस्क से बचा जा सके।
