Kalyani परिवार के **₹1 लाख करोड़** के संपत्ति विवाद को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मेडिएशन (मध्यस्थता) की अवधि को अक्टूबर के अंत तक बढ़ा दिया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने निचली अदालतों में चल रही सभी कानूनी कार्रवाइयों पर रोक लगाने का निर्देश दिया है ताकि पूर्व जज जस्टिस एल. नागेश्वर राव की देखरेख में बातचीत शांतिपूर्ण तरीके से हो सके।
कानूनी मोर्चे पर 'कूलिंग-ऑफ' पीरियड
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमल्य बागची और जस्टिस वी. मोहन शामिल हैं, ने इस विवाद को सुलझाने के लिए एक नई समयसीमा तय की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक मध्यस्थता की प्रक्रिया चल रही है, तब तक निचली अदालतों में इस मामले से जुड़ी कोई भी लिटिगेशन (मुकदमेबाजी) आगे नहीं बढ़ेगी। इसका मकसद एक ऐसा माहौल बनाना है जहां बाबा कल्याणी, सुगंधा हिरेमठ और गौरीशंकर कल्याणी के बीच चल रहे पारिवारिक मतभेद को कोर्ट के बाहर निपटाया जा सके।
निवेशकों के लिए क्यों है यह अहम?
निवेशकों की नजर इस मामले पर इसलिए टिकी है क्योंकि ₹1 लाख करोड़ से अधिक की इन संपत्तियों में Kalyani Group की पब्लिकली ट्रेडेड कंपनियों के प्रमोटर स्टेक भी शामिल हैं। बाजार के जानकारों का मानना है कि किसी भी बड़ी कॉरपोरेट हाउस में प्रमोटर की स्थिरता कंपनी की लंबी अवधि की गवर्नेंस और स्ट्रैटेजी के लिए बेहद जरूरी होती है।
'की-मैन' रिस्क और गवर्नेंस पर असर
कॉरपोरेट जगत में इसे 'की-मैन' रिस्क के तौर पर देखा जा रहा है। अगर कंपनी का नेतृत्व पारिवारिक विवादों में उलझा रहता है, तो उसका सीधा असर कंपनी के फैसलों और कामकाज की दिशा पर पड़ सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप ने फिलहाल एक बड़ी कानूनी जंग को टाल दिया है, जिससे ग्रुप कंपनियों में आने वाली संभावित वोलेटिलिटी (अस्थिरता) पर रोक लगी है।
इस मामले पर अगली स्टेटस रिपोर्ट 26 अक्टूबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट में पेश की जाएगी। निवेशकों के लिए अब अगले कुछ महीने अहम हैं, क्योंकि सुलह का नतीजा ही तय करेगा कि भविष्य में ग्रुप का मैनेजमेंट ढांचा कैसा होगा और क्या कंपनी विवादों से पूरी तरह मुक्त हो पाएगी।
