सुप्रीम कोर्ट ने AIADMK के 21 विधायकों के खिलाफ डिस्क्वालिफिकेशन (Disqualification) की कार्यवाही को रोकने के स्पीकर के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी राजनीतिक दल के आंतरिक मामलों में तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप मान्य नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें तमिलनाडु विधानसभा स्पीकर के फैसले को सही ठहराया गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस कानूनी चुनौती को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत 13 मई, 2026 को हुए विश्वास मत (Confidence Motion) के बाद हुई थी। उस दौरान 25 AIADMK विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हुए TVK के नेतृत्व वाली सरकार के समर्थन में वोट किया था। हालांकि, बाद में पार्टी लीडरशिप ने 21 विधायकों के खिलाफ चल रही डिस्क्वालिफिकेशन की कार्यवाही को वापस लेने का अनुरोध किया, जिसे स्पीकर ने स्वीकार कर लिया था।
कोर्ट का फैसला और कानूनी रुख
कोर्ट ने अपने फैसले में 'लोकस स्टैंडाई' (Legal Standing) के सिद्धांत पर जोर दिया। बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता पी.वी. सेल्वाकुमार को AIADMK के आंतरिक अनुशासनिक मामलों में हस्तक्षेप करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि जब पार्टी ने खुद ही अपने विधायकों को माफ करने का फैसला ले लिया है, तो न्यायपालिका को राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक कामकाज का सम्मान करना चाहिए।
सरकार के लिए क्या हैं मायने?
इस फैसले से तमिलनाडु विधानसभा की स्थिति स्पष्ट हो गई है। कोर्ट के हस्तक्षेप न करने से इन 21 विधायकों का पद सुरक्षित हो गया है, जिससे राज्य सरकार पर मंडरा रही राजनीतिक अनिश्चितता खत्म हो गई है। हालांकि कोर्ट ने एंटी-डिफेक्शन लॉ (Tenth Schedule) से जुड़े व्यापक कानूनी सवालों को भविष्य के लिए खुला रखा है, लेकिन वर्तमान में यह मामला पूरी तरह बंद हो चुका है। निवेशकों के नजरिए से देखें तो यह एक विशुद्ध राजनीतिक घटनाक्रम है, जिसका शेयर बाजार या किसी लिस्टेड कंपनी पर कोई सीधा असर नहीं है।
