सुप्रीम कोर्ट ने NEET-UG 2026 प्रोटेस्ट के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ के आरोपों की जांच को प्राथमिकता देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी (HPEC) से तत्काल अंतरिम रिपोर्ट मांगी है।
यौन उत्पीड़न के आरोपों पर तत्काल जांच!
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सोमवार, 24 अगस्त, 2026 को अपनी हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी (HPEC) को निर्देश दिया है कि वह NEET-UG 2026 की राष्ट्रव्यापी प्रदर्शनों के दौरान महिला प्रदर्शनकारियों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ की शिकायतों की जांच में तेजी लाए। ये आरोप 20 जून से 25 जुलाई के बीच हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़े हैं।
चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहनन भी शामिल थे, ने इस बात पर जोर दिया कि इन विशेष शिकायतों की जांच सर्वोच्च प्राथमिकता पर होनी चाहिए। कोर्ट ने कमेटी से इन शिकायतों के समाधान के लिए तुरंत एक अंतरिम रिपोर्ट सौंपने को कहा है।
HPEC आरोपों की जांच करेगा
हाई-पावर्ड एनक्वायरी कमेटी (HPEC) की स्थापना सुप्रीम कोर्ट ने 20 अगस्त, 2026 को की थी। इसका नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी कर रहे हैं। कमेटी में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस रवि शंकर झा, दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस शालिंदर कौर, पूर्व सीबीआई निदेशक ऋषि कुमार शुक्ला और मेघालय के सेवानिवृत्त डीजीपी एल.आर. बिश्नोई जैसे अनुभवी सदस्य शामिल हैं।
शुरुआत में, कमेटी का काम प्रदर्शनों के दौरान अत्यधिक बल प्रयोग, पैलेट गन जैसे अनुचित उपायों के इस्तेमाल और हिंसा की घटनाओं से जुड़ी व्यापक शिकायतों की जांच करना था। यौन उत्पीड़न के दावों को प्राथमिकता देकर, कोर्ट यह सुनिश्चित कर रहा है कि इन संवेदनशील मामलों पर तत्काल और केंद्रित ध्यान दिया जाए।
मामले की पृष्ठभूमि
ये विरोध प्रदर्शन मुख्य रूप से प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं, विशेष रूप से NEET-UG 2026 में कथित अनियमितताओं के संबंध में जवाबदेही की मांग के लिए आयोजित किए गए थे। इन प्रदर्शनों के कारण विभिन्न स्थानों पर झड़पें हुईं, जिनमें जंतर-मंतर भी शामिल था। कोर्ट का यह नवीनतम आदेश वरिष्ठ वकील शोभा गुप्ता द्वारा दायर एक याचिका के बाद आया है, जिसमें उन्होंने महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न के विशिष्ट आरोपों पर कोर्ट से सीधे संज्ञान लेने का आग्रह किया था। याचिकाकर्ता ने पीड़ितों के लिए सुरक्षित और प्रभावी ढंग से शिकायत दर्ज कराने के लिए एक स्पष्ट तंत्र, जैसे कि एक नामित अधिकारी या ईमेल चैनल, स्थापित करने का अनुरोध किया था।
शासन और कानून-व्यवस्था के दृष्टिकोण से, यह घटनाक्रम महत्वपूर्ण है क्योंकि यह नागरिक अशांति के दौरान पुलिस कदाचार के आरोपों से निपटने में न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करता है। इस जांच की प्रगति, विशेष रूप से अपेक्षित अंतरिम रिपोर्ट, आगे की कानूनी कार्यवाही और विरोध अवधि के दौरान राज्य के आचरण के मूल्यांकन को प्रभावित करेगी।
