सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि रिश्ते के दौरान आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंधों को ब्रेकअप के बाद रेप का नाम नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कानूनी कानूनों के बढ़ते दुरुपयोग पर गंभीर चिंता जताई है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने स्पष्ट फैसले में कहा है कि केवल रिश्ते के खत्म हो जाने या ब्रेकअप होने के आधार पर पहले से सहमति वाले शारीरिक संबंधों को रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बनेगा, जहां व्यक्तिगत मतभेदों को सुलझाने के लिए आपराधिक कानूनों का सहारा लिया जा रहा है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए चेतावनी दी कि सहमति से बने संबंधों को बाद में आपराधिक केस में बदलना वास्तविक यौन हिंसा के मामलों की गंभीरता को कम करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय प्रणाली का इस्तेमाल निजी बदला लेने या स्कोर सेटल करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
यह मामला केरल से जुड़ा है, जहां सात साल के रिश्ते के बाद शिकायतकर्ता ने पार्टनर के वैवाहिक स्थिति छुपाने का आरोप लगाकर रेप का केस दर्ज कराया था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थितियों को आपराधिक अपराध मानने से आरोपी की छवि पर अपूरणीय दाग लगता है और यह न्याय व्यवस्था की प्रभावशीलता को कमजोर करता है।
इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने सहमति (Consent) की बारीकियों पर कानूनी स्पष्टता दी है। कोर्ट ने जोर दिया कि रेप की परिभाषा को केवल जबरदस्ती, स्पष्ट धोखाधड़ी या हिंसा के मामलों तक ही सीमित रहना चाहिए ताकि कानून का इस्तेमाल सही तरीके से हो और असली पीड़ितों को न्याय मिल सके।
