सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व CJI YK Sabharwal के बेटों, चेतन और नितिन सभरवाल के खिलाफ इनकम टैक्स विभाग की रीअसेसमेंट कार्यवाही को हरी झंडी दे दी है। मामला साल 2007 की एक शेयर ट्रांजेक्शन से जुड़ा है, जिस पर टैक्स चोरी का संदेह है।
सुप्रीम कोर्ट ने चेतन और नितिन सभरवाल की उन अपीलों को खारिज कर दिया है, जो इनकम टैक्स विभाग की कार्यवाही के खिलाफ दायर की गई थीं। अब विभाग 2008-09 और 2009-10 के असेसमेंट ईयर के लिए जांच को आगे बढ़ा सकेगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने माना कि मार्च 2015 में जारी किए गए नोटिस के लिए टैक्स विभाग के पास पर्याप्त आधार मौजूद थे।
क्या है 2007 का शेयर विवाद?
विवाद की जड़ साल 2007 की एक ट्रांजेक्शन है, जिसकी वैल्यू करीब ₹255 करोड़ आंकी गई थी। सभरवाल ब्रदर्स ने पवन इम्पेक्स (P) लिमिटेड और SVIIT सॉफ्टवेयर (P) लिमिटेड के शेयर GYS रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड को बेचे थे। इस बिक्री के बाद, उन्होंने इनकम टैक्स एक्ट की धारा 54F के तहत कैपिटल गेन्स टैक्स में छूट का दावा किया था, क्योंकि उन्होंने इस पैसे को दिल्ली के सिकंदरा रोड स्थित एक प्रॉपर्टी में निवेश किया था।
टैक्स अधिकारियों का तर्क है कि शेयरों की बिक्री कीमत को जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया था, ताकि टैक्स से बचा जा सके।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
अदालत ने 28 अक्टूबर 2026 को अपने फैसले में साफ किया कि जांच शुरू करने के लिए टैक्स विभाग के पास पर्याप्त 'टैंजिबल मटेरियल' (ठोस सबूत) मौजूद हैं। बेंच ने स्पष्ट किया कि शुरुआती स्तर पर विभाग को यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि इनकम का असेसमेंट से बचाव हुआ है, बल्कि एक उचित संदेह और ठोस सबूत ही जांच शुरू करने के लिए काफी हैं। इस फैसले के बाद अब सभरवाल बंधुओं की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि अगर जांच में गड़बड़ी पाई जाती है, तो उन पर भारी पेनल्टी और ब्याज की देनदारी बन सकती है।
