TMC नेता Mahua Moitra से जुड़े चर्चित 'कैश-फॉर-क्वेरी' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Lokpal की याचिकाओं पर सुनवाई फिलहाल के लिए टाल दी है। केंद्र सरकार के वकील के मौजूद न होने के कारण अदालत ने जवाब दाखिल करने के लिए और समय दिया है। यह विवाद भ्रष्टाचार जांच की प्रक्रिया से जुड़ा है।
कोर्ट में सुनवाई क्यों टली?
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस Surya Kant, जस्टिस Joymalya Bagchi और जस्टिस V. Mohana की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान जब पता चला कि भारत सरकार की ओर से कोई भी पक्ष रखने के लिए मौजूद नहीं है, तो कोर्ट ने सुनवाई को आगे के लिए टाल दिया। सरकार को अब अपना काउंटर-एफिडेविट (Counter-affidavit) फाइल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया गया है।
कानूनी पेंच क्या है?
यह पूरा मामला 'Lokpal and Lokayuktas Act, 2013' की धारा 20 की व्याख्या पर टिका है। सवाल यह है कि क्या Lokpal के पास भ्रष्टाचार के मामलों में चार्जशीट दाखिल करने और मुकदमा चलाने की मंजूरी के लिए अलग-अलग प्रक्रिया (Bifurcated sanction process) अपनाने का अधिकार है।
यह कानूनी अनिश्चितता 19 दिसंबर, 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश से पैदा हुई, जिसमें कोर्ट ने Lokpal के उस फैसले को खारिज कर दिया था, जिसके तहत CBI को Mahua Moitra के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की मंजूरी दी गई थी। हाई कोर्ट का मानना है कि मौजूदा कानून में 'स्प्लिट सैंक्शन' की कोई व्यवस्था नहीं है।
आगे की राह
CBI इस मामले की जांच कर रही है, जिसमें आरोप है कि Mahua Moitra ने बिजनेसमैन Darshan Hiranandani के साथ संसद के लॉग-इन क्रेडेंशियल साझा किए थे। अब सभी की नजरें सरकार के जवाब पर टिकी हैं कि वह भ्रष्टाचार विरोधी कानून की इस प्रक्रिया पर क्या रुख अपनाती है। सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला भविष्य में इसी तरह के अन्य करप्शन केसेस के लिए एक बड़ा कानूनी नजीर (Precedent) साबित होगा।
