भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2026 को एक अहम फैसले में ओडिशा के अर्जुन जानी को बरी कर दिया है। अर्जुन को 2004 के एक तिहरे हत्याकांड में गलत तरीके से फंसाया गया था और उन्होंने 22 साल जेल में बिताए। कोर्ट ने जांच में गंभीर खामियों और ओडिशा हाईकोर्ट द्वारा प्रक्रियागत देरी के आधार पर अपील खारिज करने पर कड़ी आपत्ति जताई।
22 साल की कैद के बाद मिली आज़ादी
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच, जिसमें जस्टिस जे.बी. पर्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन शामिल थे, ने अर्जुन जानी की सजा को पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि 22 साल की लंबी कैद न्याय व्यवस्था की सामूहिक विफलता का नतीजा थी।
जांच पर उठे गंभीर सवाल
यह मामला 2004 का है, जिसमें नबरंगपुर जिले में तीन महिलाओं की हत्या हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अर्जुन को एक ही गवाह की 'कमजोर और अविश्वसनीय' गवाही के आधार पर दोषी ठहराया गया था। कोर्ट ने जांच प्रक्रिया की भी कड़ी आलोचना की, जिसमें थर्ड-डिग्री इंटेरोगेशन जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करके कबूलनामा लिया गया, जो कानूनी रूप से अमान्य था।
हाईकोर्ट के फैसले पर भी नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा हाईकोर्ट पर भी सवाल उठाए, जिसने 3,157 दिनों की प्रक्रियागत देरी का हवाला देकर अर्जुन की अपील खारिज कर दी थी। कोर्ट ने इसे 'मौलिक स्वतंत्रता की विफलता' करार दिया और कहा कि प्रक्रियागत पेचीदगियों को न्याय के आड़े नहीं आना चाहिए, खासकर जब किसी व्यक्ति की आजादी दांव पर लगी हो।
पुनर्वास के आदेश
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने कोरापुट के डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी और डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर को अर्जुन जानी के पुनर्वास और पुनर्स्थापन में मदद करने का निर्देश दिया है। यह कदम यह सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है कि जिन लोगों की जिंदगी जांच और न्यायिक प्रक्रिया की खामियों के कारण बर्बाद हो गई, उन्हें समाज में फिर से स्थापित किया जा सके।
